Saturday, September 15, 2018

क्षितिज

जहाँ मिल रहे गगन धरा
मैं वहीं तुमसे मिलूँगी,
अब यही तुम जान लेना
राह एकाकी चलूँगी ।

ना कहूँगी फ़िर कभी
कि तुम बढ़ाओ हाथ अपना,
मैं नयन तुमको बसाकर
देखती हूँ एक सपना !!!
संग मेरे तुम ना आओ,
रूठ जाऊँ, मत मनाओ
पर तुम्हारी राह में मैं
फूल बनकर तो खिलूँगी !
फ़िर वहीं तुमसे मिलूँगी !!!

जहाँ मिल रहे गगन धरा
मैं वहीं तुमसे मिलूँगी ।
अब यही तुम जान लेना
राह एकाकी चलूँगी ।

श्वास की सरगम पे पल पल
नाम गूँजेगा तुम्हारा,
चेतना के रिक्त घट में
प्रेम की पीयूष धारा !
मैं उसी अमि धार से
अभिषेक प्रियतम का करूँगी,
बाट जोहूँगी युगों तक,
दीप बनकर मैं जलूँगी !
फिर वहीं तुमसे मिलूँगी !!!

जहाँ मिल रहे गगन धरा
मैं वहीं तुमसे मिलूँगी ।
अब यही तुम जान लेना
राह एकाकी चलूँगी ।



Friday, September 7, 2018

बंधन

क्यों बाँधा मुझको बंधन में ?

रिश्तों के बंधन से ऊपर,
कुछ भाव, भाव से मिलते थे
दुनिया की परिपाटी तजकर
दो हृदय चाव से मिलते थे !
जब व्यथा एक को होती थी,
आँसू दूजे की अँखियन में !!!
क्यों बाँधा ऐसे बंधन में ?

मितवा मेरे, मनमीत बने
तुम मनवीणा के गीत बने
निर्जन में कोकिल कूजन सा
वीराने का संगीत बने !
पदचाप तुम्हारी सुनती हूँ,
अब भी मेरे उर आँगन में !!!
क्यों बाँधा ऐसे बंधन में ?

बंधन यह उर से धड़कन का,
बंधन श्वासों से स्पंदन का,
यह बंधन था मन से मन का,
बंधन प्राणों से ज्यों तन का !
मन के अथाह अंधियारे में
जीवन बीतेगा भटकन में !!!
क्यों बाँधा मुझको बंधन में ?

जब पुष्प सूख गिर जाता है,
तब वृक्ष ना अश्रु बहाता है
जब नदी सूखकर मृत होती,
सागर तब भी लहराता है !
मैं बद्ध हुई, तुम मुक्त रहे,
स्वच्छंद विहग-से उपवन में !!!
क्यों बाँधा मुझको बंधन में ?

मन के अथाह अंधियारे में
जीवन बीतेगा भटकन में !!!
क्यों बाँधा मुझको बंधन में ?









Tuesday, August 28, 2018

तू और याद आया !!!

ना पाने की चाहत, ना खोने की हिम्मत
ये है कैसा जादू, ये है कैसी शिद्दत,
कि जितना तुझे भूलना मैंने चाहा
तू और याद आया, तू और याद आया !!!

तेरे साथ बीता हुआ हर वो लम्हा
तू जब दूर होकर भी, था सामने ही !
तेरा साथ देता था जीने की ताकत
तेरे लफ्ज देते थे हर गम में राहत !
वो पल खो गए अब,जुदा हो गए अब
मगर रूह मेरी, तुझे ढूँढ़ती है !

हवा जब चली तो, कली जब खिली तो
तुझे पास पाया, तुझे पास पाया !
तू और याद आया, तू और याद आया !!!

जहां से तुझे यूँ जुदा करके देखा
तू पत्थर था तुझको खुदा करके देखा !
ये अहसास था, या थी कोई हकीकत
चमकते सितारों को पाने की चाहत !
यही चाह मेरी, मेरा जुर्म है अब !
यही राह मेरी, मेरा जुर्म है अब !

वही राह जिस पर तेरा हाथ थामे
चले दूर इतनी, कि ख़ुद को भुलाया !
तू और याद आया, तू और याद आया !!!