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Thursday, January 18, 2018

एक बवाल ऐसा भी...

रात के ग्यारह बज रहे हैं। मैं हाथ में कापी पेन लिए बेडरूम से बालकनी, बालकनी से बेडरूम के चक्कर लगा रही हूँ। 'वे' मेरी इस 'नाइट वाक' से हैरान परेशान, हथेलियों पर ठुड्डी टिकाए कभी मुझे देखते हैं और कभी घड़ी को। आखिर ना रहा गया तो बोल उठे - 'ये क्या हो रहा है?'
मैं - एक कविता लिखनी है। विषय है - बवाल।
वे - ओह ! तो फिर ?
मैं - कुछ सूझ नहीं रहा...
वे - 'बवाल' विषय पर आप निश्चय ही बहुत बढ़िया लिख सकती हैं। फिर भी, आप चाहें तो ये नाचीज आपकी कुछ मदद कर सकता है । 
मैं - (शक्की नजरों से देखते हुए ) अच्छा ! कीजिए। 
वे - तो लिखिए.....
             "बिना किसी सवाल, 
          मैं झेलूँ रोज एक बवाल !
          आलू छोटे आ गए तो बवाल !
          भिंडी बड़ी आ गई तो बवाल !
          गीला तौलिया बिस्तर पर, छोटा बवाल !
          दफ्तर से फोन ना किया, बड़ा बवाल !.....
मैं - बस ! बस ! ये आप कविता बना रहे हैं या एक नए बवाल की भूमिका ?
वे - डियर, मैं तो बस आपकी मदद.....
मैं - रहने दें आपकी मदद । मैं लिख लूँगी कुछ ना कुछ । पता है, पिछली बार 'अलाव' विषय पर लिखकर भेजा था, तो मेरी रचना पाँचवें नंबर पर आई थी। 
वे - अच्छा ! पर मुझे लगता है कि विषय 'अलाव'के बजाय 'पुलाव' होता तो आप ही पहले नंबर पर होतीं!!!

( मैंने आँखें तरेरकर देखा। उन्होंने मासूम बच्चे की तरह कान पकड़ लिए, ....सॉरी !!! )

वे - एक और आयडिया आया है । आपने वो गाना सुना है ? 'एक सवाल मैं करूँ, एक सवाल तुम करो, हर सवाल का सवाल ही जवाब हो....'
मैं - हाँ । 
वे - बन गई बात ! आप यूँ लिखिए --
        "इक बवाल मैं करूँ
       इक बवाल तुम करो !
       हर बवाल का,
       बवाल ही जवाब हो !"

( मैंने अपना सिर पकड़ लिया । )

मैं - हे भगवान ! आपको तो बताना ही नहीं चाहिए था। आपको साहित्य और कविता की कोई कद्र ही नहीं है। ना जाने कैसे नीरस इंसान हैं आप.... अजी, बवाल एक गंभीर विषय है। एक से एक संवेदनशील रचनाएँ आ रही हैं इस विषय पर और आप.....
वे - ( रजाई में मुँह घुसाकर ) लो चुप हो गया। वरना फिर से शुरू हो जाएगा एक नया...... 
दोनों साथ - बवाल !!!!
           

Saturday, January 13, 2018

अलाव

पेड़ों के टूटे पत्ते, कागज,
टूटी छितरी डालियाँ
कर इकट्ठा सुलगा दीं किसी ने !
सिमटे - ठिठुरते भिखमंगों,
अधनंगे फुटपाथियों की
सारी ठंड बटोरकर,
काँपता रहा अलाव !!!

पिता के झुकते कंधे,
माँ की उम्मीदभरी आँखें
कैसे करे वो सामना ?
आज भी ना मिली नौकरी !
तमाम डिग्रियाँ,आग में झोंककर
लगाया उसने जोरदार कहकहा,
सिसकता रहा अलाव !!!

अधभरे पेट से छल करते,
अलाव के चारों ओर
थिरकते पैर, बजती खंजड़ी,
चूल्हे पर खदबदाती खिचड़ी !
रैनबसेरा करते खानाबदोश
चल देंगे सुबह नए ठिकाने,
बंजारा हो गया अलाव !!!

तल्खियाँ

ज़िंदगी की तल्खियाँ, कुछ यूँ छुपाईं दोस्तों
दर्द की स्याही से लिख, गीतों में गाईं दोस्तों !

डूबना था कागजों की कश्तियों को एक दिन
वक्त से पहले किसी ने, क्यों डुबाईं दोस्तों !

कह गया कुछ राज की बातें, मेरा नादान दिल
अब लगे, उस अजनबी को क्यों सुनाई दोस्तों !

कुछ तड़प,कुछ बेखयाली और कुछ गफलत मेरी, 
उफ ! मोहब्बत नाम की, आफत बुलाई दोस्तों !

अपनी साँसों का गला, घोंटा किए हर एक पल
दिल लगाने की सज़ा, इस तरहा पाई दोस्तों !

यूँ लबों को मुस्कुराने की, ये आदत डाल दी
बहती आँखें, क्यों किसी को दें दिखाई दोस्तों !