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Sunday, March 26, 2017

प्रेम बड़ा छ्लता है

प्रेम बड़ा छ्लता है,
साथी, प्रेम बड़ा छलता है ।
जलती तो बाती है,
साथी, दीप कहाँ जलता है ?
प्रेम बड़ा छलता है ।

कहीं किसी से जीवनभर में
प्रीत नहीं जुड़ पाती है,
कहीं अजानी मंजिल को
राहें खुद ही मुड़ जाती हैं,
बगिया के फूलों को कब
माली का परिचय मिलता है ?

प्रेम बड़ा छलता है,
साथी, प्रेम बड़ा छ्लता है ।

मन से मन के तार जुड़ें तो,
हर दूरी मिट जाती है
हिमगिरी से निकली गंगा,
सागर तक दौड़ी आती है ।
बोलो,कब खुद सागर आकर
किसी नदी से मिलता है?

प्रेम बड़ा छलता है,
साथी, प्रेम बड़ा छलता है ।

इसी प्रेम ने राधाजी को
कृष्ण विरह में था तड़पाया,
इसी प्रेम ने ही मीरा को,
जोगन बन, वन वन भटकाया।
यह दुर्लभ उपहार प्रेम का,
कहाँ सभी को मिलता है?

प्रेम बड़ा छ्लता है,
साथी, प्रेम बड़ा छ्लता है।।

Wednesday, March 15, 2017

दोषी हो तुम !

दोषी हो तुम !
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स्वार्थ के इस दौर में जब,
अविश्वास और संदेह के भाव,
घुट्टी में पिलाए जा रहे हैं....
तुम संप्रेषित कर रहे हो,
निष्पाप भावनाएँ, कोमल संवेदनाएँ...
छूत का ये रोग क्यों फैला रहे हो ?
दोषी हो तुम !

क्यों नहीं तुम देख पाते,
शुभ्रता के आवरण में कालिमा ?
क्यों नहीं पहचान पाते,
कौन है अपना - पराया
बीज कुछ अनमोल रिश्तों के,
अभी भी बो रहे हो ?
दोषी हो तुम !

चाँद को क्यों आज भी तुम,
देखते हो 'उस' नजर से
अरे पागल, कलंकित हो चुका वह !
छू लिया इंसान ने कबका उसे !
और तुम उसको अभी तक,
प्यार अपना कह रहे हो ?
दोषी हो तुम !

Monday, March 13, 2017

होली

होली
होली के अवसर पर सारे,
रंगों को मैं ले आऊँ,
और तुम्हारे जीवन में मैं,
उन रंगों को बिखराऊँ...

लाल रंग है गुलमोहर का,
केशरिया पलाश का है,
पीला टेसू, अमलताश का,
नीला रंग आकाश का है...

मोरपंखिया रंग में मेरे,
मनमयूर का नृत्य देखना,
सिंदूरी रंग में घोले हैं,
सूर्योदय - सूर्यास्त देखना...

याद आ रही है अब मुझको,
मेरे बचपन की गुड़िया !
इसीलिए मैं भेज रही हूँ,
रंग गुलाबी की पुड़िया...

भेज रही हूँ हरे रंग में
धरती की सारी हरियाली,
ईश्वर से है यही प्रार्थना,
छाए जीवन में खुशहाली...

प्रेमरंग बिन सब रंग फीके,
रंगों बिन फीकी होली !
कोई खेले या ना खेले,
होली तो होगी, हो ली !!!