Sunday, February 17, 2019

विराम

कुछ अपरिहार्य कारणों से एक छोटे अंतराल के लिए लेखन से विदा ले रही हूँ। पिछला वर्ष मेरे लिए बहुत ज्यादा उतार चढाव का रहा। पापा को खोया। कार्यस्थल पर भी अतिरिक्त कार्यभार से मन मस्तिष्क थकान महसूस कर रहा है। जीवन में सबसे कठिन समय वह नहीं होता जब आप अपना सारा धन गँवा दें और आपके पास फूटी कौड़ी भी ना हो। मेरे अनुसार सबसे कठिन समय वह होता है जब आपको आपके 'अपनों' के असली चेहरे दिखाई दें। अब कुछ समय के लिए आत्मचिंतन की आवश्यकता है। 
आप सभी के स्नेह की प्रतीक सैकड़ों टिप्पणियाँ, जो मेरे ब्लॉग पर थीं, वे अब मेरे मन में हैं। जल्दी ही लौटूँगी। यह पूर्णविराम नहीं है। सभी को बहुत सारे स्नेह के साथ 
- मीना

Thursday, February 14, 2019

प्रेमदिवस पर मेरे प्रियतम !!!

हर बसंत में मेरे हमदम
तुमको नई बहार मिले,
प्रेम दिवस पर मेरे प्रियतम 
तुमको सबका प्यार मिले !!!

काँटे उन राहों के चुन लूँ
जिन पर कदम तुम्हारे हों,
उतने फूल बिछा दूँ जितने
आसमान में तारे हों !
मेरे नयन भरे हों तो भी
तुमको दुआ हजार मिले,
प्रेमदिवस पर मेरे प्रियतम
तुमको सबका प्यार मिले !!!

नदिया का सागर से मिलना,
धरती का अंबर से जुड़ना,
चंदा और चकवे की रातें,
बादल और बिजुरी की बातें !
मेरी हर कविता झूठी हो
तुम्हें सत्य साकार मिले !
प्रेम दिवस पर मेरे प्रियतम
तुमको सबका प्यार मिले !!!

वैसे भी, जब कवि मरता है
तब कविता ज़िंदा होती है,
प्यार जिन्हें जीवन से होता
उन्हें देख मृत्यु रोती है !
हम अपनी भावुकता में खुश,
तुम्हें लोक-व्यवहार मिले !
प्रेम दिवस पर मेरे प्रियतम
तुमको सबका प्यार मिले !!!



Sunday, January 27, 2019

टुकड़ा मैं तेरे दिल का....

पापा की उम्र हो गई थी, वे तकलीफ झेल रहे थे, शारीरिक कष्टों से उन्हें मुक्ति मिल गई, वे निर्वाण के मार्ग पर चले गए, ईश्वर उनकी आत्मा को शांति दे.....पिछले पाँच दिनों से सांत्वना के ऐसे तमाम शब्द सुनते हुए इस बात पर यकीन करने की कोशिश कर रही हूँ कि पापा अब इस दुनिया में नहीं रहे। मायका और मेरा घर पास पास ही है, करीब सात आठ मिनट की दूरी पर.... कुछ भी काम होता, कोई बात होती, पापा कहते - मीना को बुलाओ। मीना की बात पापा के लिए लोहे की लकीर थी। सितंबर 2018 में पापा की तबीयत बिगड़नी जब शुरू हुई थी तो किसी के कहने से अस्पताल नहीं जा रहे थे। मैं स्कूल से गई तो देखा, चेहरा और पैरों पर सूजन है। मैंने कहा - पापा तैयार हो जाओ, चेकअप के लिए चलते हैं। पापा तैयार हो गए। मम्मी ने आश्चर्य प्रकट किया-अभी लता ( छोटी बहन ) इतना जिद करके गई, मैंने भी कितना कहा, तब तो नहीं गए ये !!! एक सप्ताह बाद पापा की तबीयत इतनी खराब हो गई कि अस्पताल में एडमिट करना पड़ा। वहाँ से एक सप्ताह बाद छुट्टी मिली तो मैं अपने घर ले आई पापा - मम्मी दोनों को। पापा की तबीयत अब पहले से बेहतर थी, हालांकि कमजोरी बहुत थी। पंद्रह दिन की सेवा सुश्रुषा के बाद स्वास्थ्य में सुधार आता लग रहा था।
अचानक एक रात करीब ढ़ाई बजे पापा जोर जोर से रोने लगे। पापा और मम्मी हमारे बेडरूम में सोते थे और हम तीनों बाहर हॉल में (मैं, मेरे पति और बेटा अतुल)। हम तीनों उठकर भागे अंदर। मम्मी बदहवास। पापा रो रोकर बोल रहे थे - अरे ये मुझे ले जाएँगे, मुझे मार देंगे, ये मुझे मारने आए हैं। मैं घबरा तो गई थी पर हिम्मत करके पापा को छाती से चिपकाकर कहा - कौन ले जाएगा पापा ?
पापा वैसे ही रो रोकर - ये लोग, देख ना सामने खड़े। आदमी, औरतें, बच्चे सब हैं। अरे ! ये मुझे ले जाएँगे !
मैं - पापा आप मुझको पकड़ लो, किसकी हिम्मत है जो मुझसे आपको छीनकर ले जा सके !
पापा ने एकदम डरे हुए बच्चे की तरह मुझे भींच लिया। मैंने मम्मी से भगवद्गगीता माँगी और पापा से कहा - पापा, गीताजी सुनाती हूँ। आप तो रोज गीताजी पढ़ते हो, आपको कौन डरा सकता है।
एक हाथ से पापा को चिपकाए हुए, दूसरे हाथ से भगवदगीता पकड़े, पहला अध्याय पूरा सुनाया। पापा डर से थर थर काँप रहे थे। मम्मी, ये, अतुल तीनों हैरान परेशान खड़े रहे। ना जाने कौनसी दैवीय शक्ति ने मुझे उस समय हिम्मत दी। दूसरा अध्याय पूरा होते होते पापा थोड़े संयत हुए और बोले - मैं अपने घर जाऊँगा। सुबह के चार बज रहे थे। रिक्शा मँगाकर हम सब उन्हें उनके घर ले गए। वहाँ चाय पीकर पापा सो गए। उस दिन के बाद पापा जैसे संसार से विरक्त हो गए। कोई कुछ पूछता तो जवाब दे देते, अन्यथा मौन। कभी कभी टेलिविजन पर कोई प्रोग्राम देख लेते। वरना वो और उनकी भगवद् गीता। लगातार छः छः घंटे गीता पढ़ना उनका नित्यकर्म हो गया। शायद उन्हें आभास हो गया था।
इस बार तबीयत बिगड़ी तो सीधे आइसीयू में वेंटिलेटर पर। दो दिन में पापा की शक्ल बदल गई जैसे। फिर वही जिद, ये मशीनें निकाल दो, मेरा दम घुटता है। मुझे घर जाना है। एक सप्ताह डॉक्टरों ने अपनी कोशिशें करके जवाब दे दिया। घर पर ही ऑक्सीजन लगाकर रखने को कह दिया। 
18जनवरी को हम पापा को घर लाए। मम्मी ने बताया कि उनकी भगवद् गीता का पाठ अधूरा रह गया था। तब मैंने उनके पास बैठकर गीताजी के सातवें से लेकर अठारहवें अध्याय तक पढ़कर सुनाया। रात भर पापा के पास बैठी विष्णु सहस्त्रनाम का पाठ, नारायणजाप करती रही। बचपन से अब तक के पापा के सारे रूप, उनकी सारी भूमिकाएँ स्मृति को झकझोर दे रही थीं। तब ब्लॉग पर एक पोस्ट लिखी। पापा के स्वास्थ्य लाभ के लिए सभी ने प्रार्थना भी की कमेंट्स में। 
लेकिन जब चलने का वक्त आ जाता है तो कोई दुआ काम नहीं आती। 
21 जनवरी की दोपहर करीब चार बजे मैं पापा के पास बैठी उनका सिर सहला रही थी। उनका बात करना तो एक हफ्ते से बंद था। अचानक वे बोलने लगे - मीना, मैं तेरा बेटा बनूँगा। 
उनकी आवाज एकदम बदल गई थी और वे कठिनाई से ही बोल पा रहे थे। 
मैंने कहा - पापा, बेटा ही बन गए हो आप मेरा, देखो ना आपको चम्मच से खिलाती पिलाती हूँ ना बच्चे की तरह। 
पापा - नहीं, मैं तेरा बाबू बनूँगा। अतुल बनूँगा। 
मैं - अच्छा, कब बनोगे मेरा बाबू ?
पापा - आज ही बनूँगा।
मैं - पक्का ?
पापा - हाँ पक्का।
तभी ना जाने किस प्रेरणा से मेरे मुँह से निकला - पापा, आप अतुल का बेटा बनकर मेरे पास लौट आना। 
मैंने देखा कि उसके बाद पापा के चेहरे पर असीम शांति छा गई।
उस समय मेरे अलावा मेरी दो बहनें और मेरा छोटा भाई भी पापा के पास ही थे पर पापा ने मुझसे ही ऐसा क्यों कहा? यह भी एक ऋणानुबंध ही तो है !!!
उसके बाद दो तीन बार अपने दोनों हाथ उठाकर उन्होंने हमें आशीर्वाद दिया।
रात दस बजे पापा ने चार पाँच लंबी साँसें लीं और अपने पार्थिव शरीर का त्याग कर दिया। 
पापा, इस बार मैं आपको नहीं बचा पाई ! काल के क्रूर पंजे आपको छीन कर ले ही गए। आप जहाँ भी हों, परमशांति में हों ! आपका आशीष हम पर सदा बना रहे!!!