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Friday, December 30, 2016

वटवृक्ष और जूहीलता

वट वृक्ष और जूहीलता



गाँव की कच्ची पगडंडी के किनारे बहुत से वृक्ष थे. नीम, पीपल, कनेर, बहुत सारे. पर उनमें खास था एक बरगद का पेड़ - बहुत बड़ा, विशाल और बहुत ही पुराना. इस बरगद की छाँव बहुत शीतल होती थी. इतनी शीतल कि गर्मी में लू की यहाँ फटकने की हिम्मत भी नहीं होती थी. जानें कितने प्राणी, कितने जीव उस वटवृक्ष की छाया में विश्राम पाते, आश्रय लेते और कई तो थकान मिटाकर, अपनी आगे की राह चल देते.

 कुछ का तो स्थायी निवास भी था उस पर. कीड़े - मकोड़े, पंछी, गिलहरियाँ, बंदर सभी अपनी - अपनी गतिविधियों से वटवृक्ष की गंभीरता भंग करते थे. पर फिर भी वह वटवृक्ष निर्विकार, निश्चल खड़ा सबको अपना अपना हक लेने देता
.....बिना माँगे भी ...

एक खुशनुमा सुबह वटवृक्ष की निगाह अपनी जड़ों पर गई. अक्सर वहां सूखे पत्तों का ढेर लगा रहता था, वहां कुछ कीड़े - मकोड़े, चींटे रेंगते रहते . कुछ गिलहरियाँ चहल कदमी करती रहती थी. लेकिन आज वहाँ कुछ नया था ! चार नन्हीं - नन्हीं नई हरी चमकती पत्तियाँ और जड़ों के सहारे ऊपर चढ़ने का प्रयत्न करती कच्ची कोंपलें !

वटवृक्ष ने सोचा, ओह! ये तो कोई बेल है, यह यहाँ कैसेऔर कब उग आई ? चलो अब जो भी हो, जैसे भी हो अब आ गई है तो अब इसे सँभालना मेरा कर्तव्य है. यही सोच कर वटवृक्ष ने अपनी एक शाखा से उस बेल के निकट कुछ पत्ते टपकाए जिससे कि वह उन शैतान प्राणियों की नजर से छुपी रहे. उसे डर था कि ये शैतान प्राणी कहीं बेल को तोड़ ना दें.

बेल की सुरक्षा अब वटवृक्ष का रोजाना का काम हो गया था. धीरे - धीरे उस वटवृक्ष के पत्तों की आड़ में संरक्षित वह बेल लटकती जटाओं - जड़ों के सहारे बढ़ने लगी. कुछ ही दिनों में वह वटवृक्ष की लाड़ली बन गई. गंभीर रहने वाले उस वटवृक्ष के चेहरे पर भी खुशी झलकने लगी. सभी प्राणी भी इस परिवर्तन से हतप्रभ थे और सोचते कि इसका राज क्या है?

जब बेल वटवृक्ष पर  थोड़ा ऊपर पहुँची तो वटवृक्ष को पता चल गया कि यह तो जूहीलता है और समय आने पर यह सुंदर, सुवासित फूलों से इस परिसर को महकाएगी. पर वटवृक्ष  को इस बात की चिंता थी कि वह यहाँ बचकर कैसे रह पाएगी. क्या यह शैतान प्राणी इसे जीने देंगे ?

वानरसेना की उछलकूद और गिलहरियों की भागदौड़ से अब वटवृक्ष की साँस अटक सी जाती. ना जाने कब टूट जाए वह छोटी सी बेल इन शैतानों की धमाचौकड़ी में !
उधर जूही के नन्हें ओठों से शब्द फूटने लगे. वह रात - रात भर वटवृक्ष से बातें करती. कभी मूक मौन संवाद चलता, कभी खामोशी बोलती और कभी नाजुक पत्तों की ह्ल्की सरसराहट वटवृक्ष के कानों में कुछ कह जाती.

जूही अपनी धुन में वटवृक्ष के साथ जुड़ती, उसकी शाखाओं से लिपटती बढ़ती जा रही थी. बिछड़ना क्या होता है इससे बिल्कुल बेखबर ! किंतु वटवृक्ष ने दुनिया देखी थी, बिछोह की कल्पना थी उसे !
इसीलिए वह नित्य प्रभु से प्रार्थना करता कि जूहीलता को कोई योग्य संरक्षक मिल जाए. कुछ समय पहले ही उसने खुद सुना था कि यहाँ एक पक्की सड़क बनने वाली है और उसके लिए कुछ पेड़ काटे जा सकते हैं . हो सकता है उसे भी अपनी कुर्बानी देनी पड़े !

वह चिंतित था क्योंकि वानर, गिलहरी व अन्य कीड़े मकोड़े तो अपना निवास बदल लेंगे, पर इस जूही के लिए ऐसा संभव न था . आखिर उसकी प्रार्थना भगवान ने सुन ली .एक दिन उस राह एक राहगीर गुजरा. थकाहारा वह भी सबकी तरह वटवृक्ष की छाँव तले आराम करने लगा. वटवृक्ष की शीतल छाँव में कुछ ही देर में उसे नींद आ गई. जब आँख खुली तो उसकी नजर अचानक जूहीलता पर पड़ी.

अरे ! यह इतनी सुंदर बेल यहाँ ? यहाँ तो यह ऐसे ही नष्ट हो जाएगी, इसे तो मेरे उद्यान में होना चाहिए ....
बस! फिर क्या था? उस राहगीर ने जूहीलता को जड़ों से उखाड़ लिया कि वह उसे ले जाकर अपने उद्यान में रोप सके. जूहीलता को वटवृक्ष से बिछड़ना मंजूर न था. पर कौन सुनता उसका क्रंदन ? वटवृक्ष से गुहार लगाई किंतु वह तो शाँत खड़ा रहा... निश्चल.... निर्विकार ...!

जूहीलता के कुछ हिस्से वटवृक्ष में ऐसे उलझे लिपटे थे कि उन्हें तोड़ देना पड़ा. जूही का क्रंदन बढ़ता गया. एक छूटने का दर्द और दूसरा टूटने का ! वटवृक्ष तो खामोश खड़ा था. उसने राहगीर को रोकने की कोशिश तक नहीं की.
 उस अजनबी ने जूही को अपने साथ ले जाकर अपने खूबसूरत उद्यान के सबसे सुंदर स्थान पर लगा दिया. रोज पानी देता और जूहीलता का खास ख्याल करता लेकिन....
 क्या जी पाएगी जूहीलता उस नए सुरक्षित स्थान पर ?
       .....साँसें तो वहीं रह गईं थीं !!!

Tuesday, December 27, 2016

"खुशनुमा सुबह"

सुबह जगाने आया,
मस्त हवा का झोंका।
आँख खुली, मैंने
खिड़की से बाहर देखा।।

गर्दन उचका, सूर्य पूर्व से,

झांक रहा था।
आने के पहले क्या सबको
आँक रहा था ?

मैं आई बगिया में

फूलों को सहलाया।
सिमटी हुई रात रानी से
प्यार जताया।।

लाल गुलाबी कृष्ण कमल की

कलियाँ डोली।
चंपा और चमेली ने भी
आँखें खोली।।

गुलाब ने दोस्ती का

बढ़ा दिया हाथ।
बड़ी अदा से झुककर
बेला ने कहा - सुप्रभात।।

नन्हा सा चिडिया का बच्चा

हाथों पर चढ़ गया,
हौले से पकड़ उसे
चूमकर उड़ा दिया।।

आज सारे पौधों पर

खुशियाँ खिल गई,
मुझको भी इनके संग
खुशी मिल गई।।

Thursday, December 22, 2016

मत समर्पण कर !



मत समर्पण कर

मत समर्पण कर,
अब किसी के सामने
खुद को न अर्पण कर !
मत समर्पण कर ।

देवता के चरण में
तू फूल बनकर बिछ गई,
पर क्या मिला ?
फेंका गया, तू रह गई
निर्माल्य बनकर !
मत समर्पण कर ।
अब किसी के सामने....

सिंधु से करने मिलन
तू बन नदी, दौड़ी गई बाँहें पसारे
क्या मिला ?
नाम भी खोया, मधुरता भी गई
खारा हुआ जल !
मत समर्पण कर ।
अब किसी के सामने....

नवसृजन की चाह में,
तू बन धरा सहती रही हर बोझ को
पर क्या मिला ?
घायल हुई, बाँटी गई तू
रह गई आस्तित्व खोकर !
मत समर्पण कर ।

अब किसी के सामने
खुद को न अर्पण कर !
मत समर्पण कर ।।

Monday, December 12, 2016

साथ है वही तनहाई



साथ है वही तनहाई 

इर्द - गिर्द लोग हैं हजारों
साथ है मगर वही तनहाई,
ज़िंदगी लगे कभी तो नाटक
और कभी लग रही सच्चाई ।।

सूर्य अपनी रश्मियों से छूकर
अब कली कली जगा रहा,
बादलों में कोई तो चितेरा
चित्र है नए बना रहा...
किंतु मेरे नयन जिसे ढूँढ़ें
वही नहीं पड़ रहा दिखाई,
जिंदगी लगे कभी तो नाटक
और कभी लग रही सच्चाई ।।


अजनबी हाथों की डोर पर ये
नाचती है कठ-पुतलियाँ,
रच रहा कोई, किसी कलम से
बन रही नई कहानियाँ...
वह पुकार स्नेह भरी फिर क्यों
आज नहीं पड़ रही सुनाई,
जिंदगी लगे कभी तो नाटक
और कभी लग रही सच्चाई ।।

वक्त का पंछी थका - थका सा
भूलकर उड़ान कहीं बैठा,
चाँद भी है आज खोया - खोया
चाँदनी से जैसे रूठा - रूठा...
बन गई हैं ओस वही बूँदें
चाँद ने जो नैनों से बहाईं,
जिंदगी लगे कभी तो नाटक
और कभी लग रही सच्चाई ।।

Sunday, December 11, 2016

गुलमोहर

गुलमोहर !

अग्निशिखा के रंगों से भर,
खिल गए हो तुम !
हमनाम मेरे गुलमोहर,
फिर मिल गए हो तुम !

याद है तुमको
गुजारी थी कई शामें,
इसी साए में हमने...
और फूलों से मेरा आँचल
भरा था किस तरह तुमने ।

याद है उत्सव वह,
जब मिला था नाम,
मुझको इक नया...
नाम भी क्या था,
तुम्हारा नाम ही था...
'गुलमोहर'

हमनाम तब हम हो गए थे,
भूलती कैसे तुम्हें मैं,
गुलमोहर !

किंतु मौसम का बदलना
कौन रोके ?
शाख से पत्तों का गिरना
कौन रोके ?

खूबसूरत से वो लम्हे
खो गए....
पर तुम अभी भी हो,
किसी कोने में मन के...
गुलमोहर !

अग्निशिखा के रंगों से भर,
खिल गए हो तुम,
हमनाम मेरे , 
गुलमोहर !
फिर मिल गए हो तुम !
फिर मिल गए हो तुम।।

Saturday, December 10, 2016

नया इतिहास लिख दे


नया इतिहास लिख दे

अपनी धरती, अपना ही
आकाश लिख दे,
अपनी मेहनत से नया
इतिहास लिख दे ।

लोग तेरी राह में
पलकें बिछा दें,
तू अलग अपना नया
अंदाज लिख दे ।
अपनी धरती...

हौसले गर हों बुलंद
तो मंज़िलों की क्या कमी ?
सबके दिल में बस यही
एहसास लिख दे ।
अपनी धरती...

पत्थरों की बस्तियों में
लोग पत्थर हो गए,
पत्थरों के दिल में भी
जज्बात लिख दे ।
अपनी धरती...

इस जहाँ में अपना साया
भी नहीं अपना,
फिर भी तू सबके लिए
बस प्यार लिख दे ।
अपनी धरती...
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Friday, December 9, 2016

नींव इमारत की


नींव इमारत की

आपने पौधे लगाए, और
फल हम खा रहे,
थामकर उँगली चलाया,
हम तभी तो चल रहे।।

उम्र भर औरों के ही,
वास्ते सब कुछ किया,
तन दिया, मन भी दिया
औ' सारा जीवन भी दिया
ना किए कुछ शौक पूरे,
गम भी सारे सह लिए.....
थामकर उँगली चलाया,
हम तभी तो चल रहे।।

आप हैं वह नींव जिस पर
हम इमारत हैं खड़ी,
अपने बच्चों की भलाई
आप सोचें हर घड़ी,
दर्द हो बच्चों को तो भी
आपके आँसू बहे....
थामकर उँगली चलाया,
हम तभी तो चल रहे।।

आप हैं वटवृक्ष जिसकी
छाँव भी आशीष है,
आप हैं ममता की लोरी,
ज्ञान वाली सीख हैं
सीखते हैं आपसे हम,
चाहे जितने पढ़ रहे।।
थामकर उँगली चलाया,
हम तभी तो चल रहे।।

काँपते हाथों में भी है
प्यार की ताकत अभी,
अपने अनुभव के खजाने
बाँटिए हमसे कभी,
भूल हमसे हो कभी तो
माफ भी करते रहें....
थामकर उँगली चलाया,
हम तभी तो चल रहे।।
(मेरे प्यारे मम्मी पापा को समर्पित )

Thursday, December 8, 2016

नहीं आता.


नहीं आता

रहते हैं इस जहान में, कितने ही समझदार !
हम बावरों को क्यूँ यहाँ, रहना नहीं आता ?

कोई कहाँ बदल सका, इन अश्कों की फितरत !
ये बह चले तो बह चले, रुकना नहीं आता ।

धागा कोई उलझे तो, सुलझ जाएगा इक दिन
रिश्ता कभी उलझे तो, सुलझना नहीं आता ।

इतना ना जोर दे, बड़ी नाजुक है ये डोरी !
जो टूट गई इसको फिर, जुड़ना नहीं आता ।

रहता है जाने कौन, इस पत्थर के मकाँ में !
दिखता है दिल-सा, फिर भी धड़कना नहीं आता ।

भटकी जो नाव, बह गई दरिया में इस कदर !
फँस करके इस भँवर में, निकलना नहीं आता ।

अब कौन से लफ्जों में कहें, उनसे हाल-ए-दिल !
बेहतर यही कि मान लें, कहना नहीं आता।।


Tuesday, December 6, 2016

नशा - एक जहर


नशा - एक जहर


नशे की राह में कई गुमराह हो रहे,
ये नौनिहाल देश के तबाह हो रहे ।

कहता है कोई पी के
भूल जाएगा वो गम,
कहता है कोई छोड़ दूँगा
आपकी कसम !
उज्जवल भविष्य कितनों के ही,
स्याह हो रहे....
ये नौनिहाल देश के तबाह हो रहे ।

साँसों को जलाकर
बनाया खाक इन्होंने,
परिवार की खुशियों को
किया राख इन्होंने,
क्यों बेटियों के फिर भी
इनसे ब्याह हो रहे....
ये नौनिहाल देश के तबाह हो रहे ।

हैं कौन वे जो बो रहे
नशे का ये जहर,
वे हैं भुजंग से भी बड़े
विषभरे विषधर,
इनकी वजह से जुर्म
बेपनाह हो रहे....
ये नौनिहाल देश के तबाह हो रहे ।

कई तो फँसें जानकर
ये ऐसा जाल है,
अभिशाप है जीवन का,
ये अकाल काल है,
इसके शिकार लोग
सरेराह हो रहे....
क्यूँ नौनिहाल देश के तबाह हो रहे ?

नशे की राह में कई गुमराह हो रहे,
ये नौनिहाल देश के तबाह हो रहे ।।

Sunday, December 4, 2016

मैं और घड़ी


मैं और घड़ी 

घड़ी के काँटे
जीवन के पल - क्षण
सबमें बाँटें !

घड़ी की टिक - टिक
कहती है ना रुक
थकना मना !

इसके इशारों पर
चलती हूँ यंत्रवत
स्वयंचालित !

अब तो बने ज्यों
इक - दूजे की खातिर
मैं और घड़ी !

सुइयों से अपनी
बाँधकर लेती है
अनगिन फेरे !

वक्त की चेतावनी
ऋतु है मनभावनी
जाएगी बीत !

उनका है साथ जब
घड़ी - घड़ी फिर क्यूँ
घड़ी देखे !
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Friday, December 2, 2016

अब ना रुकूँगी !


अब ना रुकूँगी !

अब ना रुकूँगी !
बहुत रुक चुकी,
इस इंतजार में,
कि लौटोगे तुम तो साथ चलेंगे ।

डोर से कटी पतंग सी
कट चुकी, फट चुकी ये जिंदगी !
भागते-भागते उस
कटी पतंग के पीछे,
गुजरे दिन, महीने, साल !

चलो कोई नहीं,
अब तो लूट ही लिया उसे
आ गई है डोर हाथों में,
फटी ही सही, हाथ तो आ गई
पतंग जिंदगी की !

जोड़ भी लूँगी
प्यार का गोंद मिल गया है,
विश्वास की तीलियाँ भी हैं,
जोड़ ही लूँगी !

अब ना रुकूँगी,
बहूँगी नदिया - सी ।
मिलना हो तो पहुँचो, 
सागर किनारे !
अब वहीं मिलूँगी,
अब ना रुकूँगी !
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Tuesday, November 29, 2016

ना जाने क्यों...


ना जाने क्यों ?

ना जाने क्यों, खिंचा चला
आता है कोई....

ना है सूरत का पता,
और ना ही सीरत का,
कोई जान ना पहचान,
पर अहसान मानता है कोई ।

वक्त की उँगलियों ने
तार कौन से छेड़े ?
आज मन का मेरे
सितार बजाता है कोई ।

नहीं मिला जो ढूँढ़ने से
सारी दुनिया में,
आज अंतर से क्यूँ
पुकार लगाता है कोई ।

ताउम्र बहे अश्क,
पर समेट लिए अब,
उनकी कीमत जो
मोतियों से लगाता है कोई

कैसे कहूँ कि कौनसी ताकत
कहाँ - कहाँ पर है,
नजर न आए मुझे
फिर भी खींचता है कोई ।

ना जाने क्यों खिंचा चला
आता है कोई ।।
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Sunday, November 27, 2016

साँझ - बेला


साँझ - बेला

विदा ले रहा दिनकर
पंछी सब लौटे घर,
तरूवर पर अब उनका
मेेला है !

दीप जले हैं घर - घर
तुलसी चौरे, मंदिर,
अंजुरि भर सुख का ये
खेला है !

रात की रानी खिली
कौन आया इस गली,
संध्या की कातर-सी
बेला है !

मिल रहे प्रकाश औ' तम
किंतु दूर क्योंकर हम,
भटकता है मन कहीं
अकेला है !

विरह - प्रणय का संगम
नयन हुए फिर से नम,
फिर वही बिछोह का दुःख
झेला है !

मेघ-राग


मेघ-राग
पुरवैय्या मंद-मंद,
फूल रहा निशिगंध,
चहूँ दिशा उड़े सुगंध,
कण-कण महकाए...

शीतल बहती बयार,
वसुधा की सुन पुकार,
मिलन चले हो तैयार,
श्यामल घन छाए....

चंचल दामिनी दमके,
घन की स्वामिनी चमके,
धरती पर कोप करे,
रुष्ट हो डराए....

गरजत पुनि मेह-मेह
बरसत ज्यों नेह-नेह
अवनी की गोद भरी
अंकुर उग आए....

अंग-अंग सिहर-सिहर,
सहम-सहम ठहर-ठहर
प्रियतम के दरस-परस,
जियरा अकुलाए....

स्नेह-सुधा से सिंचित,
कुछ हर्षित, कुछ विस्मित,
कहने कुछ गूढ़ गुपित
अधर थरथराए....

Saturday, November 26, 2016

कवि की कविता


कवि की कविता

मन के एकांत प्रदेश में,
मैं छुपकर प्रवेश कर जाती हूँ.
जीवन की बगिया से चुनकर
गीतों की कलियाँ लाती हूँ।।

तुम साज सजाकर भी चुप हो
मैं बिना साज भी गाती हूँ
जो बात तुम्हारे मन में है
मैं कानों में कह जाती हूँ।।

तुम कलम उठा फिर रख देते
मैं ठिठक खड़ी रह जाती हूँ
तुम कवि, तुम्हारी कविता मैं
शब्दों का रस बरसाती हूँ।।

जब शब्दकोश के मोती चुन
तुम सुंदर हार बनाओगे
वह दोगे भला किसे बोलो
मुझको ही तो पहनाओगे।।

तुमसे मैं हूँ, मुझसे तुम हो
जब याद करो आ जाती हूँ,
तुम कवि, तुम्हारी कविता मैं,
शब्दों का रस बरसाती हूँ ।।
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माँ की चिट्ठी

माँ की चिट्ठी
(बेटे के नाम)
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तुझे कहूँ मैं दिल का टुकड़ा
या कहूँ आँखों का तारा,
तुझे कहूँ मैं चाँद या सूरज,
या कहूँ जान से प्यारा।

तुझे पता है,
ये सारे शब्द कम हैं,

तेरे लिए  प्यार मेरा ,
शब्दों में समा नहीं सकता,
तुझे पाकर ही मैंने,
दुनियाँ की दौलत पाई है,
यह मेरा दिल
तुझको दिखा नहीं सकता

तेरे लिए इतना ही कह सकती हूँ
तू मेरा अंश है
तू मेरे सपनों का प्रतिबिंब है
तू मेरी परछाई है
मैंने तुझमें हमेशा
अपनी ही झलक पाई.है.

तू मेरा बेस्ट फ्रेंड है
मेरे मन की हर बात
बिना कहे ही जान लेता है,
तू मुझे कभी सताता है जिद करके,
तो कभी हँसाकर तंग करता है
कभी मुझसे रूठता, गुस्सा होता,
चिल्लाता आक्रोश प्रकट करता है.
तो कभी पीछे से आकर,
मुझे गुदगुदा देता है.

किसी और का मुझको        
'माँ' न कहने देना,
तेरे प्यार का ही तो सबूत है ....
मुझे कोई चिंता नहीं है अपनी,
जब तक तू मेरे साथ मौजूद है...
जब तक तू मेरे साथ मौजूद है।
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Friday, November 25, 2016

हमसफर


हमसफर

आओ हम तुम
बन जाएँ हमसफर,
हो जाएगी आसान
ये मुश्किल भरी डगर ।

ना  तुमको ये पता हो
पहुँचना कहाँ हमें,
ना मुझको ही पता कि
ठहरना कहाँ हमें ।
मंजिल हो वहीं पर
जहाँ खुशियों का हो शहर।।
आओ हम तुम
बन जाएँ हमसफर,
हो जाएगी आसान
ये मुश्किल भरी डगर।।

ये गीले दरख्तों से,
टपकता हुआ पानी,
ये लहरें समंदर की,
ये नदियों की रवानी
जी लें जरा-सी जिंदगी,
दो पल यहीं ठहर ।
आओ हम तुम
बन जाएँ हमसफर,
हो जाएगी आसान
ये मुश्किल भरी डगर।।

हर रंग के गुलों से
महकता हो जो चमन,
इंसानियत ही हो जहाँ
हो प्यार औ' अमन
ऐसा जहान खोज लूँ
तू साथ दे अगर ।
आओ हम तुम
बन जाएँ हमसफर,
हो जाएगी आसान
ये मुश्किल भरी डगर।।
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बालकों से....

तुम मुस्कुराते रहना,
और खिलखिलाते रहना,
बनकर गुलाब अपनी
खुशबू लुटाते रहना।।

सपने जरूर देखो,
जी भर के जी लो जीवन...
हर रंग के सुमन से,
महके तुम्हारा जीवन...
हर हाल में कदम बस
आगे बढ़ाते रहना।।
तुम मुस्कुराते रहना,
और खिलखिलाते रहना,
बनकर गुलाब अपनी
खुशबू लुटाते रहना।।

तुम पर बुराइयों का,
ना हो असर कभी भी...
रहना कमल की भाँति,
चाहे रहो कहीं भी...
अपने गुणों का दर्शन
सबको कराते रहना।।
तुम मुस्कुराते रहना,
और खिलखिलाते रहना,
बनकर गुलाब अपनी
खुशबू लुटाते रहना।।

जीवन बहुत है छोटा,
और काम हैं बहुत से...
नहीं व्यर्थ में गँवाना,
कुछ पल भी जिंदगी के...
तुम बाहरी चमक से
खुद को बचाते रहना।।
तुम मुस्कुराते रहना,
और खिलखिलाते रहना,
बनकर गुलाब अपनी
खुशबू लुटाते रहना।।

छोटा लगे हिमालय,
तुम वह मुकाम पाना...
इतना तरक्की करना,
झुक जाए ये जमाना...
लेकिन बड़ों के आगे
सर को झुकाते रहना।।
तुम मुस्कुराते रहना,
और खिलखिलाते रहना,
बनकर गुलाब अपनी
खुशबू लुटाते रहना ll
-=-=-=-=-=-=-=-


Thursday, November 17, 2016

अनमोल रिश्ते


अनमोल रिश्ते


कुछ रिश्ते,
होते हैं बड़े अनमोल...
पर वे अपने होने का,
नहीं पीटते ढ़ोल ।

नहीं जताते वे आपस में
किसने कितना सुख - दुःख बाँटा,
नहीं बताते इक दूजे संग
वक्त उन्होंने कितना काटा ?
उन रिश्तों में अश्रु-हास्य का
हर पल होता है मेल - जोल...

कुछ रिश्ते,
होते हैं बड़े अनमोल...

उन रिश्तों को कोई आँधी
कहाँ डिगा पाती है ?
उन रिश्तों को कोई हस्ती
कहाँ मिटा पाती है ?
उन रिश्तों में लेन - देन का
कोई मोल ना तोल ...

कुछ रिश्ते,
होते हैं बड़े अनमोल ।
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Sunday, November 13, 2016

कोयल ....क्या बोले ?



कोयल ....क्या बोले ?


कोयल तू क्या बोले?
जब भी अपना मुँँह खोले,
कानों में मिसरी घोले...
कोयल तू क्या बोले ?

कहाँ की वासी तेरा पता दे,
किसे पुकारे जरा बता दे,
पीपल, अंबिया, नीम, कदंब,
इस तरु से उस तरु डोले...

कोयल तू क्या बोले ?
जब भी अपना मुँँह खोले
कानों में मिसरी घोले ।

तेरी बोली जब सुन पाऊँ,
तुझे खोजने दौडी़ आऊँ,
तू छिप कर फिर कहाँ ,
मेरे मन के भावों को तौले

कोयल तू क्या बोले?
जब भी अपना मुँँह खोले,

तेरा मेरा क्या है नाता,
क्यों तेरा सुर इतना भाता ?
क्यों तेरे  सुर पंचम को सुन,
खाए हिया हिचकोले....

कोयल तू क्या बोले ?
जब भी अपना मुँँह खोले,
कानों में मिसरी घोले ।

मेरा संदेशा लेते जाना,
फिर तू उनके सम्मुख जाना,
उन वादों की याद दिलाना ,
लेकिन हौले - हौले...

कोयल तू क्या बोले ?
जब भी अपना मुँँह खोले,
कानों में मिसरी घोले,
कोयल तू क्या बोले ?
---------------------------

Friday, November 11, 2016

अब तो अपने दिल की मानो


अब तो अपने दिल की मानो

बड़े-बड़े सुख पाने की
जब से मन में ठानी,
छोटी-छोटी खुशियों की
हमने दे डाली कुर्बानी...

अच्छे हैं वे लोग जिन्होंने
अपने दिल की मानी,
अपनी राहें खुद खोजी
दुनिया की रीत ना मानी ।

मन कुछ कहता हमने उसकी
बात ना कोई मानी,
नकली सुख के पीछे भागे
सच्चाई ना जानी ।

बड़ी देर से पता चला,
ये कैसी थी नादानी
छोटी छोटी खुशियों की...

बारिश की नन्हीं नन्हीं
बूँदें थीं हमें बुलाती,
फूल, तितलियाँ, चंदा, तारे
भेज रहे थे पाती ।

सागर की लहरें मिलने का
संदेशा भिजवाती,
ठंडी पुरवैय्या हमसे कुछ,
कहने को रुक जाती ।
पर हम व्यस्त रहे कामों में,
कदर ना उनकी जानी
छोटी छोटी खुशियों की...

द्वार पर थी रातरानी,
महकता था मोगरा
खुला आँगन, जैसे उपवन
पेड़-पौधों से हरा ।

मिटाकर बगिया बनाया
हमने अपना घर बड़ा,
शांति का मंदिर गिराकर
शीशमहल किया खड़ा ।

अब किसको दें दोष,
सूरतें लगती सब अनजानी
छोटी छोटी खुशियों की...

Tuesday, November 8, 2016

ख्वाहिश



ख्वाहिश


सुनो,
मुझे कुछ जुगनू ला दो....
टिमटिम करते जुगनू ला दो ।
जुगनू ?
पागल हो तुम ।
चंदा ला दूँ ? तारे ला दूँ ?
एक - दो नहीं, सारे ला दूँ ?
नहीं,
मुझे बस जुगनू ला दो ।

उन्हें सजा लूँगी जूड़े में,
और टाँक लूँगी आँचल में....
कभी पहनकर उनके गहने,
तुम से मिलने आऊँगी मैं ।
बस थोड़े से जुगनू ला दो,
टिमटिम करते....

और रात की डिबिया में भर,
कुछ को रख लूँगी सिरहाने ।
बाँचूँगी फिर वो सारे खत,
जो लिखे थे, तुमने मुझको ।
टिमटिम करते जुगनू ला दो....

सुनो,
मुझे कुछ जुगनू ला दो ।
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Monday, October 31, 2016

पापा,आपने कहा था....



पापा, आपने कहा था....
पापा,
आपने कहा था ,
बिटिया तो चिड़िया होती है...

उड़ जाती है एक दिन,
अपना नया घर बसाने के लिए ।
छोड़ जाना होता है उसे,
अपनों को ।

पापा,
आपने शायद
सच नहीं कहा था...

चिड़िया तो चहचहाती है,
मनचाहे गीत सुनाती है ।
बिना किसी अनुमति के गाती है,
कभी भी, कहीं भी ।

पापा,
आपने सच क्यों नहीं कहा..?

मैं यदि चिड़िया होती,
तो अभी उड़ आती आपके पास ।
यहाँ गाना-चहचहाना तो दूर,
हल्की सी चूँ-चूँ पर भी,
कितनी हैं बंदिशें ।

पापा,
आपने शायद ऐसा
इसीलिए कहा होगा कि
भेज सकें मुझे खुद से दूर...

समझाया होगा अपने ही मन को,
मुझे समझाने के बहाने ।
चिड़िया तो खुश ही रहती है,
मेरी बिटिया भी खुश रहेगी ।
यही ना ?

पापा,
आपकी चिड़िया खुश है ।
पापा की चिड़िया
खुश है.
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Thursday, October 27, 2016

सिया के राम


सिया  के राम


वनगमन सिया का सबने देखा,
अश्रू राम के किसने देखे ?
बोले राम, प्रिया तुम बिन
जीवन के सब दिन गए अलेखे ।

भिन्न शरीर हमारे लेकिन
इक दूजे से एकरूप हम
सिया राम से, राम सिया से
अलग कहाँ जी पाते इक क्षण ?

मुझ पर राज्यपिपासु होने का
लगा हुआ अब तक आरोप,
वन भेजा तुमको मैंने
क्या मुझे नहीं था इसका क्षोभ ?

कलियुग में भी कई राम हैं
और कई सीताएँ हैं,
कर्तव्यों से बँधे हुए सब
सबकी अपनी गाथाएँ हैं !

इस धरती के सारे मानव
चाहे मुझको दे लें दोष ,
क्षमा माँगता हूँ मैं तुमसे
तुम मुझ पर ना करना रोष ।
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दीपावली


दीपावली
आसमाँ ने तारों के
दीप जलाए हैं,
धरती पर भी मानो
सितारे जगमगाए हैं ।

दीपावली की रात
कितनी अनोखी है,
आसमाँ और धरती
दोनों मुस्कुराए हैं ।

नन्हें - नन्हें माटी के
दीप हुए रोशन,
मानो प्रकाशदूत
धरती पर आए हैं ।

दीपकों की सेना है
शस्त्र है उजाले का,
इनके आगे अँधियारा
टिक नहीं पाए है ।

घर हुए जगमग
रोशन हुए गलियारे,
मन भी उमंगों की
रांगोली सजाए है ।

मीठे बोलों से मीठा
कोई उपहार नहीं,
पर्व यह प्रकाश का
हमको सिखाए है ।
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( चित्र गूगल से साभार )

Wednesday, October 19, 2016

नन्हीं बुलबुल


नन्हीं बुलबुल

मेरे घर  की बालकनी  में बुलबुल ने घोंसला बनाया । ये मेरे लिये अनोखी बात थी । एक नया अनुभव था । 15-20 दिन लगातर काम करके , एक एक तिनका लाकर वह घोंसला बनाती । मैं उसकी कड़ी मेहनत की साक्षीदार थी । घोंसला अब एक छोटी सी टोकरी का आकार ले चुका  था। कभी कभी वो जोड़ी में आते थे । लेकिन अक्सर उनमें से एक ही आता था। मेरी  उत्सुकता बढ़ती जा रही थी आखिर कब देगी वो
अंडे ? कैसे होंगे बुलबुल के बच्चे ?  

 लेकिन रामनवमी के दिन सुबह सुबह बालकनी से कौवे की आवाज़ आई । मैं दौड़ी । पर कौवा पूरे घोंसले कौ चोंच में उठाये उड़ गया । दो दिन तक बेचारी बुलबुल बालकनी में चक्कर काटती रही । घोंसले को आधार देने के लिये  एक झूला सा बनाया था , उसी के पास आती फ़िर उड़ जाती।
बाद में उसने आना बंद कर दिया। मैं खुद को कोसती । दूसरी बालकनी में पक्षियों के लिये पानी ना रखती तो शायद कौवा नहीँ आता ।
                                             
  दोस्तों, कहानी अभी पूरी नहीँ हुई है । कल से  वो दोनो फ़िर आये हैं । फ़िर वहीं पर  घोंसला बना रहे हैं और हम इंसानों को जीने का ढंग सिखा रहे हैं ।

Sunday, October 16, 2016

कहता होगा चाँद


कहता होगा चाँद

जब बात मेरी तेरे कानों में कहता होगा चाँद
इस दुनिया के कितने ताने, सहता होगा चाँद...

कभी साथ में हमने-तुमने उसको जी भर देखा था
आज साथ में हमको, देखा करता होगा चाँद...

यही सोचकर बड़ी देर झोली फैलाए खड़ी रही
पीले पत्ते सा अब, नीचे गिरता होगा चाँद...

अँबवा की डाली के पीछे, बादल के उस टुकड़े में
छुप्पा-छुप्पी क्यों बच्चों सी, करता होगा चाँद...

मेरे जैसा कोई पागल, बंद ना कर ले मुट्ठी में
यही सोचकर दूर-दूर, यूँ रहता होगा चाँद...
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Friday, October 14, 2016

माफ करना वीर मेरे !


माफ करना वीर मेरे !

माफ करना वीर मेरे !
मैं तुम्हें ना दे सकी...
श्रद्धांजलि !

हर तरफ था जिक्र तेरे शौर्य का !
हर जुबाँ पर थी,
तेरी कुर्बानियों की दास्ताँ !
वीर मेरे ! रो रहे थे नैन कितने...
दिल भी सबके रो रहे थे !

देखती पढती रही मैं
वीरता की हर कहानी, 
जिसमें तुम थे !
नमन - वंदन क्या मैं कहती, 
शब्द कम थे !
वीर मेरे ! कोई उपमा ना मिली !

माफ करना वीर मेरे !
मैं तुम्हे ना दे सकी...
श्रद्धांजलि !

है मेरा भी लाल कोई
जैसे तुम थे माँ के अपनी...
बस उसी के अक्स को
तेरी जगह रखा था मैंने !

हाँ, उसी पल से...तभी से...
रुह मेरी सुन्न है और 
काँपते हैं हाथ मेरे !
शब्द मेरे रो पड़े और 
रुक गई मेरी कलम भी !
वीर मेरे ! अश्रुधारा बह चली...

माफ करना वीर मेरे !
मैं तुम्हें ना दे सकी...
श्रद्धांजलि ! श्रद्धांजलि !
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Thursday, September 29, 2016

एक प्रश्न..


 एक प्रश्न..


मई का महीना बहुत कम लोगों को पसंद आता है अपनी तेज जलाने वाली धूप और गर्मी के कारण लेकिन दो प्रजातियाँ ऐसी भी हैं जो इस महीने का इंतजार साल भर करती हैं --

जी हाँ ! सही समझा आपने । 
शिक्षक और विद्यार्थी .... और
इनमें से एक प्रजाति में मेरा समावेश होता है ।

मई की अलसाई दोपहर में चिड़ियों के प्याले में पानी भरने मैं अपनी बालकनी में पहुँची तो सहसा नीचे नज़र चली गई । एक सात-आठ साल की लड़की नंगे पैर उस जलती सड़क पर जा रही थी । इक्का दुक्का लोग और भी थे। लेकिन सब मानो जल्दी में थे । मैंने आवाज देकर लड़की को रोका,

"सुनो, इधर देखो, ऊपर ।" उसने सुना और ऊपर देखा । मैंने कहा , "कहाँ रहती हो?"
उत्तर मिला,"सामने।" 

मैं समझ गई। सड़क के उस पार मैदान में कुछ झुग्गियाँ थी सड़क बनाने वाले मजदूरों की। मैंने अपने पैरों में पहनी हुई चप्पलें नीचे फेंक दी । उसने तुरंत चप्पलें पैरों में डाल ली । मुझे संतोष हुआ ।

अगले दिन दोपहर एक बजे के करीब मैं एक रिश्तेदार के घर से लौट रही थी । वही लड़की फिर सामने। बगल में पानी का कलसा दबाए, नंगे पैर। "अरे ! कल मैंने जो चप्पलें दी थीं वो क्यों नहीं पहनी? पैर जलते नहीं क्या तुम्हारे ? कहाँ गई चप्पलें?" मैंने एक साथ कई प्रश्न दाग दिए ।

"चुड़ैल के पास ।" जवाब मिला.
उन भोली आँखों में डर का साया नजर आया । 

"चुड़ैल के पास ? 
तुम्हे कैसे मालूम ?" 
मैं कुछ समझ नहीं पाई । 

"हाँ, आज सुबह माँ बापू से कह रही थी 
'दे आया उस चुड़ैल को नई चप्पलें' । 

दो दिन पहले माँ को साड़ी दी थी मालकिन ने, वो भी चुड़ैल को दे दी थी बापू ने ।"

"अच्छा, तुम कल सुबह यहीं मिलना, मैं तुम्हारे नाप की चप्पलें ला दूँगी।" वह सिर हिलाकर आगे बढ़ गई और एक सवाल छोड़ गई मेरे सामने ....

कब तक औरत ही औरत की दुश्मन बनती रहेगी ?
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Saturday, September 24, 2016

माँ मुझसे मिलने आती है...

माँ मुझसे मिलने आती है....

दुआओं के खजाने लुटाती है,
काँपते हाथों से
मेरा सिर सहलाती है,
मूक निगाहों से भी
कितना कुछ कह जाती है...
माँ मुझसे मिलने आती है....

लाती है पिटारे भरकर
भूली - बिसरी यादों के,
झुर्रियों में छुपाती है
कुछ दर्द झूठे नातों के,
"तू खुश तो मैं भी खुश"
ये कहकर माँ हँस जाती है...
माँ मुझसे मिलने आती है...

तुझको मैं पढ़ने से रोकती थी
बेटा, बात-बात पर मैं तुझे टोकती थी,
अच्छा हुआ, अपनी
ज़िद पर तू अड़ गई
मैं तो अनपढ़ रही
पर बेटी तू तो पढ़ गई !
यही बात बार-बार, 
कहकर पछताती है...
माँ मुझसे मिलने आती है...

मेरा भी मन है माँ
मैं तेरी सेवा करूँ,
मेरे साथ तू रह या
तेरे साथ मैं रहूँ ,
किसने बनाए रिवाज़
दूर हमें करने के ,
बेटियों को पाल-पोस
घर से विदा करने के,
साथ में ना बेटी के, 
माँ कोई रह पाती है...
माँ मुझसे मिलने आती है...
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Wednesday, September 21, 2016

रहिए जरा सँभलकर


रहिए जरा सँभलकर 

मंजिल है दूर कितनी, 
इसकी फिकर न करिए
बस हमसफर राहों के, 
चुनिए जरा सँभलकर...

काँटे भी ढूँढते हैं, 
नजदीकियों के मौके
फूलों को भी दामन में, 
भरिए जरा सँभलकर...

कुछ गलतियों की माफ़ी, 
देता नहीं जमाना
नादानियों में गलती, 
करिए जरा सँभलकर...

जब साथ हो कोई तो, 
उसकी कदर समझिए
ना साथ छूट जाए, 
रहिए जरा सँभलकर...

ये कौन सी हैं राहें , 
ले जाएँगी कहाँ पर ?
इन अजनबी राहों पर, 
चलिए जरा सँभलकर...

इन मुस्कुराहटों के , 
पीछे है राज़ कोई
मिलिए सभी से लेकिन, 
मिलिए जरा सँभलकर...
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Thursday, September 15, 2016

जीने की जिद मैं करती हूँ !


जीने की जिद मैं करती हूँ !

हाँ ! अपने कुछ जख्मों को 
सीने की जिद मैं करती हूँ !
नारी हूँ तो नारी - सा 
जीने की जिद मैं करती हूँ !

कोमल हूँ कलियों से भी 
पर पत्थर से कठोर भी हूँ
रहस्यमयी रजनी सी मैं, 
चैतन्यमयी भोर सी हूँ
अब अपने जज्बातों को, 
कहने की जिद मैं करती हूँ !
नारी हूँ तो नारी सा...

मुझको नहीं पुरुष से स्पर्धा, 
अपने ऊपर है विश्वास
नहीं ! मैं नहीं वह सीता, 
जो झेल सके दो - दो वनवास
अपने अधिकारों को अब, 
पाने की जिद मैं करती हूँ !
नारी हूँ तो नारी सा...

अबला की गिनती में आना, 
अब मुझको स्वीकार नहीं
शांत, विनम्र, मधुर, ममतामय 
हूँ लेकिन लाचार नहीं
हर दुर्योधन, दुःशासन से, 
लड़ने की जिद मैं करती हूँ !
नारी हूँ तो नारी सा...
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Thursday, September 8, 2016

काश....


काश....

"माँ, नदी देखने चलोगी ?"

मेरे बीस वर्ष के बेटे ने ये सवाल किया तो लगा सचमुच वह बड़ा हो गया है । वह अच्छी तरह जानता है मुझे नदी देखना कितना अच्छा लगता है।

बारिश के मौसम में उफनती नदी को देखना ऐसा लगता है मानो किसी ईश्वरीय शक्ति का साक्षात्कार हो रहा हो । रेनकोट पहनकर मैं तुरंत तैयार हो गई । तेज बारिश हो रही थी। दस मिनट में हम पुल पर थे जिसके नीचे से उल्हास नदी अपने पूरे सौंदर्य और ऊर्जा के साथ प्रवाहमान हो रही थी ।

"बाबू , चल ना दो मिनट किनारे तक चलें, कोई रास्ता है क्या
नीचे उतरने का ?" मैंने पूछा।

"हाँ , है तो । लेकिन सिर्फ दो मिनट क्योंकि इस समय काफी सुनसान रहता है वहाँ नीचे। पुल के ऊपर से आप चाहे जितनी देर देख लो ।"

पुल से नीचे उतरने वाली ढलान पर गाड़ी रोक कर लॉक की और हम नीचे उतर कर नदी के किनारे खड़े हो गए ।

उस वक्त नदी में कल-कल का संगीत नहीं था, घहराती हुई गर्जना थी .. तभी कुछ दूरी पर किनारे बैठे युवक की ओर ध्यान खिंच गया । वह घुटनों में सिर छुपाए बैठा था । दीन - दुनिया से बेखबर !

मैंने बेटे की ओर देखा लेकिन मेरे कुछ कहने से पहले ही मेरा समझदार सुपुत्र बोल उठा, "बस, अब आप कुछ कहना मत । वह लड़का वहाँ क्यों बैठा है, कौन है , ये सब मत पूछना प्लीज.. अब जल्दी चलें यहाँ से।"

"लेकिन वह अकेला क्यों बैठा है ? डिप्रेशन का शिकार लग रहा है बेचारा।"
     
"कुछ नहीं डिप्रेशन - विप्रेशन । ये अंग्रेज चले गए डिप्रेशन छोड़ गए । जिम्मेदारियों से भागने का सस्ता और सरल उपाय! बस डिप्रेशन में चले जाओ । आप नहीं जानतीं। ये चरसी या नशेड़ी होगा कोई । आप चलो अब ।"

"अरे , मैं नहीं बात करूँगी, तू तो एक बार पूछ कर देख। शायद उसे किसी मदद की जरूरत हो ।"

"नहीं ममा, आप चलो अब । बारिश बढ़ गई है और यह जगह
कितनी सुनसान है ।" अब बेटे के स्वर में चिढ़ और नाराजगी साफ जाहिर हो रही थी ।

मजबूर होकर मैं घर चली आई । घुटनों में सिर छुपाए बैठा वह लड़का दिमाग से निकल ही नहीं रहा था ।

अगले दिन.....सुबह सैर के लिए निकली । पड़ोस के जोगलेकर जी हर सुबह नदी किनारे तक सैर करके आते हैं । मैं नीचे सड़क पर आई तो वे मिल गए । हर रोज की तरह प्रफुल्लित नहीं लग रहे थे ।  मैंने पूछा -- "क्या बात है भाई साहब, तबीयत ठीक नहीं है क्या ?"

थके से स्वर में बोले, "क्या बताऊँ, सुबह-सुबह इतना दुःखद दृश्य देखा । नदी से दो लाशें निकाली हैं पुलिस ने । एक लड़के और लड़की की । आत्महत्या का मामला लग रहा है ।"

मेरा सिर चकरा गया । घुटनों में सिर छुपाए वह लड़का आँखों के सामने घूम गया । कहीं वही तो नहीं.....

जिंदगी में अनेक बार ऐसे प्रसंग आए हैं जब घटना घटित हो जाने के बाद सोचती रह गई हूँ --

काश.......
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Monday, September 5, 2016

शिक्षक


शिक्षक


शिक्षक की क्षमता क्या है
यह भूल गया है खुद शिक्षक,
कोई याद दिलाए उसको
वही देश का असली रक्षक ।

माना सीमाओं पर रक्षा
करते हैं फौजी भाई,
लेकिन उनको देशभक्ति भी
शिक्षक ने ही सिखलाई ।

डॉक्टर, वैज्ञानिक, व्यापारी
गायक हों या कलाकार,
नेता हों या अभिनेता
सब शिक्षक ने ही किए तैयार ।

विद्याधन वह बाँटा करता, 
करता झूठा मान नहीं,
और बालकों को अनुशासन में
रखना आसान नहीं ।

अगली पीढ़ी का भविष्य है
शिक्षक के ही हाथों में,
उसके योगदान को समझो
मत बहलाओ बातों में ।

हर बालक का हो विकास
यह करता है प्रयत्न शिक्षक,
कोई याद दिलाए सबको
वही देश का असली रक्षक ।
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