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Friday, November 11, 2016

बंदी चिड़िया



बंदी चिड़िया


सोने का पिंजरा था,
पिंजरे में चिड़िया थी,
पिंजरा था खिड़की के पास
फिर भी चिड़िया रहती थी उदास ।

हर सुविधा थी, सुख था,
पानी और दाना था,
लेकिन चिड़िया को तो
बाहर ही जाना था,
लड़ना तूफानों से
खतरे उठाना था,
बंधन खुलने की थी आस..
चिड़िया रहती थी उदास ।

देखकर खुला गगन,
आँखें भर आती थी,
उड़ने की कोशिश में
पंख वो फैलाती थी,
पिंजरे की दीवारों से
सर को टकराती थी,
व्यर्थ थे उसके सभी प्रयास..
चिड़िया रहती थी उदास ।

दिन गुजरते गए,
स्वप्न बिखरते गए,
भूली उड़ना चिड़िया
पंख सिमटते गए,
इक दिन मौका आया
पिंजरा खुला पाया,
फिर भी उड़ने का ना किया प्रयास..
चिड़िया रहती थी उदास ।

दोस्तो गुलामी की
आदत को छोड़ो तुम,
तोड़ो इस पिंजरे को
हौसले ना तोड़ो तुम,
संघर्ष और मेहनत से
मुँह को ना मोड़ो तुम,
बैठो मत होकर निराश..
जैसे चिड़िया रहती थी उदास ।
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