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Wednesday, November 9, 2016

भव - सागर



भव - सागर


मैंने नजर उठाकर देखा,
जब भी अपने चारों ओर...
स्वार्थ, ईर्ष्या औ' लालच का,
पाया कहीं ओर ना छोर ।

क्यों लगता है मुझको ऐसा,
सारी खुशियाँ हैं झूठी,
खिलने के पहले ही आखिर,
क्यों इतनी कलियाँ टूटीं ?

क्यों गुलाब को ही मिलता है,
हरदम काँटों का उपहार ?
क्यों रहता है कमल हमेशा,
कीचड़ में खिलने, तैयार ?

क्यों लगते हैं नकली, सारे
रिश्ते नातों के बंधन,
इस जीवन - सागर के तट पर,
क्यों एकाकी मेरा मन ?

मन चंचल, छोटे बच्चे सा,
तंग करे हर पल मुझको,
हर पल करता है प्रश्न नए,
बोलो क्या उत्तर दूँ उसको ?
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