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Sunday, December 11, 2016

गुलमोहर

गुलमोहर !

अग्निशिखा के रंगों से भर,
खिल गए हो तुम !
हमनाम मेरे गुलमोहर,
फिर मिल गए हो तुम !

याद है तुमको
गुजारी थी कई शामें,
इसी साए में हमने...
और फूलों से मेरा आँचल
भरा था किस तरह तुमने ।

याद है उत्सव वह,
जब मिला था नाम,
मुझको इक नया...
नाम भी क्या था,
तुम्हारा नाम ही था...
'गुलमोहर'

हमनाम तब हम हो गए थे,
भूलती कैसे तुम्हें मैं,
गुलमोहर !

किंतु मौसम का बदलना
कौन रोके ?
शाख से पत्तों का गिरना
कौन रोके ?

खूबसूरत से वो लम्हे
खो गए....
पर तुम अभी भी हो,
किसी कोने में मन के...
गुलमोहर !

अग्निशिखा के रंगों से भर,
खिल गए हो तुम,
हमनाम मेरे , 
गुलमोहर !
फिर मिल गए हो तुम !
फिर मिल गए हो तुम।।