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Thursday, December 8, 2016

नहीं आता.


नहीं आता

रहते हैं इस जहान में, कितने ही समझदार !
हम बावरों को क्यूँ यहाँ, रहना नहीं आता ?

कोई कहाँ बदल सका, इन अश्कों की फितरत !
ये बह चले तो बह चले, रुकना नहीं आता ।

धागा कोई उलझे तो, सुलझ जाएगा इक दिन
रिश्ता कभी उलझे तो, सुलझना नहीं आता ।

इतना ना जोर दे, बड़ी नाजुक है ये डोरी !
जो टूट गई इसको फिर, जुड़ना नहीं आता ।

रहता है जाने कौन, इस पत्थर के मकाँ में !
दिखता है दिल-सा, फिर भी धड़कना नहीं आता ।

भटकी जो नाव, बह गई दरिया में इस कदर !
फँस करके इस भँवर में, निकलना नहीं आता ।

अब कौन से लफ्जों में कहें, उनसे हाल-ए-दिल !
बेहतर यही कि मान लें, कहना नहीं आता।।