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Wednesday, August 31, 2016

ज़िंदगी हर पल कुछ नया सिखा गई


ज़िंदगी हर पल कुछ नया सिखा गई


जिंदगी हर पल कुछ नया सिखा गई
ये दर्द में भी हँस कर जीना सिखा गई ।

हम चुप रहे तो जिंदगी बोली कि कुछ कहो
जब बोलने लगे तो चुप रहना सिखा गई ।

यूँ मंजिलों की राह भी आसान नहीं थी
बहके कदम तो फिर से सँभलना सिखा गई ।

काँटे भी कम नहीं थे गुलाबों की राह में
खुशबू की तरह हमको बिखरना सिखा गई ।

अच्छाइयों की आज भी कीमत है जहाँ में

दामन को दुआओं से ये भरना सिखा गई ।

ना आरजू किसी की ना किसी का इंतजार

अपने ही दम पे हर कदम रखना सिखा गई ।
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Tuesday, August 23, 2016

जन्माष्टमी के अवसर पर


जन्माष्टमी के अवसर पर


सबको है अब प्रतीक्षा
कान्हा तेरे आने की ,
बंसी के बजाने की
माखन के चुराने की ।

माँ यशुमति के हाथों
कान्हा बहुत सजे हो ,
मुझको भी मिले मौका
अब तुमको सजाने का ।

तेरी मोहिनी छवि को
लग जाए ना नजर ,
काला लगा दूँ टीका
नटखट जरा ठहर !

इस साँवली सलोनी
सूरत पे वारी जाऊँ ,
ना देखे और कोई
दिल में तुम्हें छुपाऊँ ।

ये स्वार्थ है या लालच
चाहे जो भी नाम दे दो ,
पर कुछ पलों को अपनी
सेवा का काम दे दो ।

व्यापे ना मोह कोई
मोहन तुम्हीं बचाना ,
अर्जुन के सारथी थे
मेरी नाव भी चलाना ।
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Saturday, August 20, 2016

प्रेरणा


 प्रेरणा

स्कूल का पहला दिन । नया सत्र,नए विद्यार्थी।कक्षा में प्रवेश करते ही लगभग पचास खिले फूलों से चेहरों ने उत्सुकता भरी आँखों और प्यारी मुस्कुराहटों के साथ "गुड मॉर्निंग मैम " कहकर खड़े होकर स्वागत किया तो एक नई ऊर्जा से भर उठी मैं ।

अभिवादन का जवाब देते हुए अपनी नजरों के दायरे में पूरी कक्षा को समेटते हुए आखिरी बेंच पर बैठी नई लड़की पर नजर टिक गई जो मेरे कक्षा में आने पर भी खड़ी नहीं हुई थी।

उसे अनदेखा करके मैं हाजिरी लेने लगी । दसवींकक्षा के ये विद्यार्थी मेरे लिए नए नहीं हैं । पिछले साल नवीं कक्षा में मैं इनको हिंदी विषय पढ़ाती थी, पर यह एक नया नाम है...

'विभा माने' 

मेरे नाम पुकारने पर भी बैठे - बैठे ही एक हाथ ऊपर करके जवाब दिया ,"प्रेजेंट मैम"
   
अजीब ढीठ लड़की है ! मैनर्स सिखाए ही नहीं किसी ने !

ऐसे तो मेरी क्लास के और बच्चे भी बिगड़ जाएँगे ।अब मेरे अंदर की टीचर जाग गई थी । 

"विभा, आप नए हो इस स्कूल में ?" 
"जी मैम।"
"कौनसे स्कूल से आई हो ?"
"वाणी विद्यामंदिर , रायपुर से मैम" मधुर नम्र शब्दों में जवाब लेकिन अब भी बैठे - बैठे ही ।

"टीचर्स के आने पर और उनसे बात करते समय खड़े होते हैं , इतना भी आपको सिखाया नहीं गया ?"
 
इसके जबाब में उसने सिर झुका लिया था । सारी कक्षा के बच्चों की नजरें कभी उसकी तरफ तो कभी मेरी ओर । विभा की आँखों से टप - टप आँसू झर रहे थे ।

तभी पहली बेंच पर बैठी सुरभि उठकर मेरे पास आई और बहुत धीरे से कहा...

"मैम, विभा खड़ी नहीं हो सकती। उसके बड़े भैया उसे गोद में उठाकर कक्षा में बिठा गए थे । हम सबसे कहा है उसका खयाल रखने को।"

"हे भगवान ! कितनी बड़ी गलती हो गई मुझसे । विभा, मुझे माफ करना । मुझे कुछ भी पता नहीं था। प्रिंसिपल मैडम भी शायद भूल गई मुझे तुम्हारे बारे में सूचित करना। बच्चों, आज से विभा मेरी बेटी है । विभा, मुझे गर्व है कि तुम मेरी कक्षा में हो । तुम हम सबकी प्रेरणा बनोगी ।"
 
अगले कुछ पलों में....

मेरे गले लगी विभा और मेरी कक्षा में गीली आँखों के साथ मीठी मुस्कुराहटों की गंगा - जमुना का पवित्र संगम हो रहा था। 
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Friday, August 12, 2016

पेड़ - एक अमानत


पेड़ - एक अमानत


पेड़....
एक कविता है,
माटी की रची हुई,
सँभालकर रखें उसे
बाँचनी है अगली पीढ़ियों को भी।

पेड़....
एक गीत है,
पंछियों के सुरीले कंठ का,
लिखकर रखें उसे
गाना है अगली पीढ़ियों को भी।

पेड़....
एक चित्र है,
किसी अनजान चित्रकार का,
फीका ना पड़ने दें
निरखना है अगली पीढ़ियों को भी।

पेड़....
एक मूर्ति है,
जग के निर्माता की,
सुरक्षित रखें उसे
दर्शन करने हैं अगली पीढ़ियों को भी।

पेड़....
एक विरासत है,
धरती की अमानत है,
सँजोकर रखें उसे
सौंपनी है अगली पीढ़ियों को।

पेड़... एक अमानत है।
सँभालकर रखें उसे
अगली पीढ़ियों के लिए भी।।
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Thursday, August 4, 2016

एक रोमांचक अनुभव


एक रोमांचक अनुभव


श्रावण महीने का दूसरा रविवार...मेरी बहनों ने भीमाशंकर जाने का प्रोग्राम बनाया। मेरी भी कई बरसों की इच्छा पूरी हुई। हमारा आठ लोगों का ग्रुप बन गया था। मेरे और मेरी छोटी बहन के पति, एक सहेली, बहन और सहेली की सास को मिलाकर ।

  सुबह के ताजगीभरे समय में यात्रा करने का अलग ही मजा होता है।उसपर बारिश लगातार हो रही थी।रास्ते की हरियाली, मालशेज घाट के झरने और जंगल का सौंदर्य निहारते हम भीमाशंकर पहुँच गए जो बारह ज्योतिर्लिंगों में से एक है।

   बारिश से बचने के लिए वहाँ छाता कोई काम नहीं आता, तेज हवा से उलट जाता है। खैर भीगते-भीगते हम मंदिर पहुँचे।मंदिर पहाड़ों से घिरा हुआ है। बादल जैसे धरती पर उतर आए थे। आप से पाँच-छः फुट दूर खड़ा इंसान आपको न दिख सके, इतनी धुंध !

    बड़ी देर तक कतार में लगकर हम मंदिर के अंदर पहुँचने ही वाले थे कि कुछ लोग चिल्लाए, "साँप, साँप...!" लोग घबराहट में लोहे की रेलिंग पर चढ़ने लगे, जो अक्सर मंदिरों में कतार में खड़े रहने के लिए बनाई जाती है। घबरा तो मैं भी गई मगर अचानक किसी दैवी प्रेरणा से मैंने लोगों को भगदड़ मचाने से रोकना शुरु किया ।

   लोग जहाँ से जगह मिले, भागने की कोशिश में थे।बूढ़े और बुजुर्ग लोग भी थे वहाँ। मैं और मेरी सहेली लोगों को चिल्ला-चिल्लाकर नीचे उतरने और भगदड़ न मचाने के लिए प्रार्थना करते रहे । लोगों पर हमारी बात का असर हो रहा था क्योंकि मैंने उनसे कहा कि साँप काटने से कोई मरे ना मरे, भगदड़ मच गई तो कितनों की जान जाएगी ?

     ओम नमः शिवाय का जोर-जोर से जाप करते लोगों ने देखा कि साँप ने हजारों की भीड़ में से अपना रास्ता बना लिया और मंदिर की दीवार के नीचे एक छेद में गुम हो गया ।

   लोगों की समझदारी से कहें या ईश्वर की महिमा से, पर कोई अप्रिय घटना नहीं हुई । मैंने मन ही मन ईश्वर को धन्यवाद दिया।
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