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Saturday, September 23, 2017

बस, यूँ ही....

नौकरी, घर, रिश्तों का ट्रैफिक लगा, 
ज़िंदगी की ट्रेन छूटी, बस यूँ ही !!!

है दिवाली पास, जैसे ही सुना,
चरमराई खाट टूटी, बस यूँ ही !!!

डगमगाया फिर बजट इस माह का,
हँस पड़ी फिर आस झूठी, बस यूँ ही !!!

साँझ की गोरी हथेली पर बनी,
सुर्ख रंग की बेलबूटी, बस यूँ ही !!!

झोंपड़ी में चाँदनी रिसती रही,
चाँद कुढ़ता बाँध मुट्ठी, बस यूँ ही !!!

एक दीपक रात भर जलता रहा,
तमस की तकदीर फूटी, बस यूँ ही !!!

राह तक पापा की, बिटिया सो गई,
रोई-रोई, रूठी-रूठी, बस यूँ ही !!!




Sunday, September 17, 2017

स्पंदन - विहीन !

ओ रंगीले भ्रमर !
कैसे स्वागत करती तुम्हारा ?
लाख कोशिशों से भी मुझे,
कुमुदिनी बनना न आ सका !
कंटकों के बीच जन्मी
कुसुम कलिका तो थी मैं,

किंतु.....
नागफनी का पुष्प बनकर
खिलना भी कोई खिलना है ?
गंध - मरंद विहीन !!!

ओ मेरे हृदय !
नहीं सीख पाई मैं,
तुम्हारी धड़कन बनकर गूँजना !
साँसों में समाकर, रक्त में घुलकर,
तुमको छूकर निकलती रही,
क्षण प्रतिक्षण !!!

किंतु......
गीत ना बन सकी धड़कनों का !
खामोश साँसों का
संगीत भी कोई संगीत है ?
प्रतिध्वनी विहीन !!!

ओ मेरे कवि !
नहीं बन पाई मैं,
तुम्हारी प्रेरणा, आराधना !
मैं तुम्हारी कलम की स्याही बन
थामती, सँभालती रही तुम्हारी,
भावनाओं के ज्वार को !!!

किंतु.....
स्थान मेरा सदा ही,
तुम्हारी नजरों के दायरे में रहा,
मन मस्तिष्क में नहीं !
बेजान अहसासों के साथ,
जीना भी कोई जीना है ?
स्पंदन विहीन !!!












Friday, September 15, 2017

अबूझे प्रश्न


मैंने नजर उठाकर देखा,
जब भी अपने चारों ओर...
स्वार्थ, ईर्ष्या औ' लालच का,
पाया कहीं ओर ना छोर ।

सहते रहते क्यों हर पीड़ा 

मूक, मौन, निष्पाप ह्रदय ?
किन पापों की सजा भुगतते,
निष्कपटी, निर्दोष, सदय ?

क्यों लगता है मुझको ऐसा,

सारी खुशियाँ हैं झूठी,
खिलने के पहले ही आखिर,
क्यों इतनी कलियाँ टूटीं ?

क्यों गुलाब को ही मिलता है,

हरदम काँटों का उपहार ?
क्यों रहता है कमल हमेशा,
कीचड़ में खिलने, तैयार ?

क्यों लगते हैं नकली, सारे

रिश्ते नातों के बंधन ?
इस जीवन - सागर के तट पर,
क्यों एकाकी मेरा मन ?

मन चंचल, उत्सुक बच्चे सा,
तंग करे हर पल मुझको,
निशि दिन करता है प्रश्न नए,
बोलो क्या उत्तर दूँ उसको ?

Thursday, September 14, 2017

हिंदी का क्या है !

वाणी पिछले बारह वर्षों से एक अंग्रेजी माध्यम के प्राइवेट स्कूल में बतौर हिंदी शिक्षिका कार्यरत थी।
वाणी हिंदी में एम ए थी, वो भी विशेष योग्यता के अंकों के साथ, किंतु स्कूल में हिंदी पढ़ाते समय उसे अनेक कटु अनुभवों से दो चार होना पड़ा । उसने पाया कि ना हिंदी का कोई सम्मान है और ना हिंदी शिक्षिका का ।

कई बार तो उसने पाया कि हिंदी के घंटे में पिछ्ली बेंचों पर विद्यार्थी गणित, अंग्रेजी या विज्ञान का काम करते रहते थे । हिंदी का क्या है, आसान तो है, परीक्षा के समय पढ़ लेंगे तो भी बहुत है, यह विचार बच्चों के मन में घर कर चुका था। वाणी ने यह भी पाया कि बच्चों के अभिभावक भी हिंदी की पढ़ाई के प्रति लापरवाह थे ।

हिंदी में बच्चों की लिखावट पर भी निचली कक्षाओं से ही ध्यान नहीं दिया था किसी ने । मात्राओं और व्याकरण की अशुध्दियाँ तो आम बात थी। केवल गिने चुने विद्यार्थी ही थे जो हिंदी को अन्य विषयों की तरह गंभीरता से लेते थे हालांकि उद्देश्य उनका भी एक ही था - कुछ प्रतिशत अंक ज्यादा पा लेना।

.......वाणी भी कितना करती ? आठवीं कक्षा तक नई शिक्षानीति की मेहरबानी से उत्तीर्ण होते आए विद्यार्थी जब उसे नवीं या दसवीं में मिलते, तो उनकी हालत देख वह सिर पकड़ लेती । कइयों को ठीक से पढ़ना नहीं आता, स्वर और व्यंजन तक का ज्ञान नहीं होता ।

खैर, अपनी कड़ी मेहनत और बालकों के प्रति सहानुभूतिपूर्ण अपनत्व से वाणी हिंदी विषय और हिंदी साहित्य में विद्यार्थियों की रुचि जगाने में सफल रही थी। अंग्रेजी माध्यम के विद्यार्थी थे इसलिए उन्हें जितना हो सके, सरल शब्दों में समझाती । हिंदी की कविताएँ गाकर सुनाती ताकि बच्चों को हिंदी से लगाव हो जाए। हिंदी की पाठ्येतर पुस्तकें पढ़ने के लिए प्रोत्साहित करती । हिंदी से संबंधित अनेक स्पर्धाओं में अपने छात्र छात्राओं को अव्वल आते देख वह फूली नहीं समाती थी।

बारह वर्ष बीत गए। अब वाणी स्कूल में हिंदी की विभागाध्यक्ष थी। इस वर्ष हिंदी दिवस को विशेष तौर से मनाने की योजना उसने तैयार कर रखी थी। प्रधानाध्यापकजी से अनुमति भी ले ली थी। बच्चों से तैयारी भी शुरू करवा दी थी । 13 सितंबर को आधी छुट्टी के बाद चपरासी आया, "मैम, प्रिंसिपल सर ने आपको बुलाया है।"
अगला पीरियड खाली था तो वाणी प्रिंसिपल के कार्यालय में जा पहुँची । प्रिंसिपलजी ने उसे बैठने का आदेश दिया और धीर गंभीर आवाज में बोले-
"वाणी, कल का कार्यकम रद्द कर दो।"
वाणी पर तो मानो बिजली गिर पड़ी। उसने थोड़ा नाराजी भरे स्वर में कहा, " लेकिन सर, बच्चे सारी तैयारी कर चुके हैं ।"
प्रिंसिपल - "हाँ, तो उनकी तैयारी व्यर्थ तो नहीं जाएगी। किसी और स्पर्धा में काम आ जाएगी। कल मैनेजमेंट के लोग आ रहे हैं । स्कूल का मुआयना और टीचर्स के साथ मीटिंग करना चाहते हैं। मैं भी व्यस्त रहूँगा ।"
वाणी क्या कहती ? हालांकि कहना तो बहुत कुछ चाहती थी पर जानती थी कि प्रिंसिपल मैनेजमेंट को जवाब नहीं दे सकते । उनकी मजबूरी है।
अगले दिन 14 सितंबर था। वाणी ने अपनी कक्षा में ही छोटी सी निबंध स्पर्धा आयोजित कर ली । अन्य छात्रों को समझा-बुझाकर लौटा दिया।
पाठशाला की छुट्टी के बाद सभी शिक्षकों को सभागृह में रुकना था, मीटिंग के लिए । मैनेजमेंट के प्रतिनिधि बोलने के लिए खड़े हुए । सामान्य बातों के बाद उन्होंने कहा -
The agenda of today's meeting is to discuss about encouraging our students to speak in English. It is very sad that most of the times our teachers also speak in Hindi. How will the students develop habit of speaking in English ? Ours is an English medium school. I want that from today itself, all of us should start speaking in English, at least in the school premises. No other language. I hope you.........

आगे ना जाने क्या क्या कहा उन्होंने..... वाणी ने कुछ नहीं सुना । उसके कानों में उसके प्रिय गीत की पंक्तियाँ गूँज रही थीं -
                  हिंदी हैं हम वतन है, हिंदोस्तां हमारा....

......और उसकी आँखें हिंदी दिवस और हिंदी से जुड़े अपने सपनों को चकनाचूर होते देख रही थीं...... सोच रही थी वह कि आखिर कौन जिम्मेदार है नई पीढ़ी की इस सोच के लिए कि - हिंदी का क्या है !!!

Saturday, September 9, 2017

अंधेर नगरी, चौपट राजा !

अंधेर नगरी, चौपट राजा !
टका सेर भाजी, टका सेर खाजा !

राजा पर कोई, अँगुली उठाए,
अँगुली क्या, गर्दन अपनी कटाए !
पंगु व्यवस्था है, अंधा कानून
रोम जले, नीरो बाँसुरी बजाए !

श्वापदों से क्रूरतम, अब मनुष्य हो गया,
सत्य और अहिंसा की, चिताएँ सजा जा ।।
अंधेर नगरी, चौपट राजा !

रामजी के देश में, रावणों का राज
बर्बरता, निष्ठुरता, दमन का रिवाज !
मुँह पर बाँधो पट्टी, बोलो इशारों में
गंध लहू की पसरी, गलियों बाजारों में !

नीच,बोल बोल रहे, ठोंक ठोंक छाती !
लज्जा का चीरहरण, तू भी करवा जा ।।
अंधेर नगरी, चौपट राजा !

आजादी की दुल्हन ने, फाँसी लगाई
धर्म औ' सियासत की, हो गई सगाई !
बेबाक दीवानों को, अक्ल नहीं आई
बोलने की कीमत, रक्त से चुकाई !

झूठी संवेदना की,चाह नहीं रूहों को,
फिर भी श्रद्धांजलि की, रस्म तो निभा जा ।।
अंधेर नगरी, चौपट राजा !

Thursday, September 7, 2017

चलो, खिल्ली उड़ाएँ

चलो हम खिल्ली उड़ाएँ,
लोग जो अच्छे हैं,सच्चे हैं,
सरल हैं, सीधे हैं,
देश की जो सोचते हैं,
भाईचारा पोसते हैं,
उन्हें धमकाएँ, डराएँ !!!
हम मजाक उनका बनाएँ !!!

वे युवक,जो नहीं करते
नकल पश्चिम सभ्यता की,
वे युवतियाँ, जो नहीं करती
तमाशा असभ्यता का,
आज भी रखें बड़ों का मान,
मर्यादा रखें छोटों की जो !
चलो उनको बरगलाएँ
उनकी हम खिल्ली उड़ाएँ !!!

जो ना लें रिश्वत, नहीं हों
लिप्त भ्रष्टाचार में,
जो करें विश्वास,
नेकी, दया, सदाचार में.
खरी सच्ची बात कह दें,
बिन डरे और बिन झुके
दिन को दिन और
रात को जो रात कह दें
मार्ग से उनको हटाएँ !!!

चलो, हम खिल्ली उड़ाएँ !!!



Monday, September 4, 2017

अध्यापक, शिक्षक या टीचर ?

ओ एकांत कुटी-चर !
तू टीचर बनकर कहाँ आ गया !
वन के पशु भी सजग रहे,
पर तू ही धोखा यहाँ खा गया !

तू वशिष्ठ था जिन्हें, राम भी,
कर प्रणाम, सौभाग्य समझते !
सांदीपन की समिधा लाते,
कृष्ण सुदामा मेह बरसते !
यदि चाणक्य नहीं होते तो,
चंद्रगुप्त को कौन जानता ?
खो आया सम्मान कहाँ, वह
जिसको तेरे नैन तरसते !!!
अरे ! चंद चाँदी के टुकड़ों,
पर जीना क्यों तुझे भा गया ?
ओ एकांत कुटीचर !
तू टीचर बनकर कहाँ आ गया !

जिस समाज में रहने आया
वह तो तेरे योग्य नहीं था,
अब तू उसके योग्य नहीं है
यह विडंबना दुःखद नहीं क्या ?
देख पराई चुपड़ी को तू,
क्यों अपना जी ललचाता है ?
अरे, भूल पर भूल ना करना,
रह पाएगा तू ना कहीं का !!!
रक्षा कर लो उस गुरुत्व की,
जिसे विश्व में देश पा गया !
ओ एकांत कुटीचर !
तू टीचर बनकर कहाँ आ गया !

साहस रख, प्रत्येक परिस्थिति,
स्थाई कभी न रहे, ना रही है !
आज राष्ट्र की बागडोर,
अध्यापक के हाथों में ही है !
भूल गए वो यदि अपना,
पूर्व रूप, तो भी चिंता क्या ?
नया वर्ग निर्माण, यह भी
ध्रुव सी अविचल,बात नहीं क्या ?
शिक्षक वर्ग कहेगा- 'शिक्षक व्यर्थ नहीं'
कुछ यहाँ रह गया !
ओ एकांत कुटीचर !
तू टीचर बनकर कहाँ आ गया ?
( कुटी-चर = कुटिया का वासी )
***********************

यह कविता मेरी रचना नहीं है। मेरी एक छात्रा वंदना शर्मा ने मुझे यह कविता कुछ वर्षों पहले दी थी। 'शिक्षक दिवस' के अवसर पर मेरे संकलन से आज यह सुंदर कविता आप सभी के पठन हेतु प्रस्तुत है......

Saturday, September 2, 2017

शब्द

मानव की अनमोल धरोहर
ईश्वर का अनुपम उपहार,
जीवन के खामोश साज पर
सुर संगीत सजाते शब्द !!!

अनजाने भावों से मिलकर
त्वरित मित्रता कर लेते,
और कभी परिचित पीड़ा के
दुश्मन से हो जाते शब्द !!!

चुभते हैं कटार से गहरे
जब कटाक्ष का रूप धरें,
चिंगारी से बढ़ते बढ़ते
अग्निशिखा हो जाते शब्द !!!

कभी भौंकते औ' मिमियाते
कभी गरजते, गुर्राते !
पशु का अंश मनुज में कितना
इसको भी दर्शाते शब्द !!!

रूदन,बिलखना और सिसकना
दृश्यमान होता इनमें,
हँसना, मुस्काना, हरषाना
सब साझा कर जाते शब्द !!!

शब्द जख्म और शब्द दवा,
शब्द युद्ध और शब्द बुद्ध !
शब्दों में वह शक्ति भरी, जो
श्रोता को कर दे निःशब्द !!!

बिन पंखों के पंछी हैं ये
मन-पिंजरे में रहते कैद,
मुक्त हुए तो लौट ना पाएँ
कहाँ-कहाँ उड़ जाते शब्द !!!

Friday, September 1, 2017

हद हो गई !

हमने इक पत्थर उठा, मंदिर में मन के रख लिया,
लोग कहते हैं हमारे, प्यार की हद हो गई....

आँख मूँदे, हाथ थामे, साथ तेरे  चल पड़े
अजनबी एक शख्स पर, ऐतबार की हद हो गई...

हाँ, कि दिल जलता है ग़र तुम दूसरों को देख लो
ये तुम्हारे पर मेरे इख़्तियार की हद हो गई...

देखकर हमको, तेरा वो मुँह घुमा लेना सनम !
बेरुखी तेरी, दिले - बेज़ार की हद हो गई....

जिस्म की मंडी लगी, रूहों का सौदा हो गया,
जब मोहब्बत बिक गई, व्यापार की हद हो गई....

राह तकता रह गया था, चाँद की कोई चकोर
वो अमावस रात थी, इंतज़ार की हद हो गई....




Wednesday, August 30, 2017

शिकायत

आज दिल ने मेरे मुझसे ये शिकायत की है
ये कहो, तुमने कभी मुझसे मुहब्बत की है ?

मैंने ख्वाबों को तेरे, अपनी निगाहें दे दीं
तेरे जज्बातों को धड़कन में पनाहें दे दीं !
फिर भी तुमने सदा गैरों की हिमायत की है
आज दिल ने मेरे मुझसे ये शिकायत की है !

जख्म होंगे तेरे, लेकिन दर्द तो मुझको मिला
आँसू तेरे गिरे, दामन हुआ मेरा गीला !
अपनी खुशियों की तेरे नाम वसीयत की है
आज दिल ने मेरे मुझसे ये शिकायत की है !

ये जमाना कभी तेरा ना हुआ, ना होगा
मुझसे बढ़कर कोई, तेरा नहीं अपना होगा !
तेरे हर राज़ में मैंने ही तो शिरकत की है
आज दिल ने मेरे मुझसे ये शिकायत की है !

भटकता फिरता हूँ तन्हा, यूँ दीवाना हूँ तेरा
तेरे वजूद का हिस्सा हूँ, फसाना हूँ तेरा !
तेरे ओठों पे तबस्सुम की ही, हसरत की है
आज दिल ने मेरे मुझसे ये शिकायत की है !










Monday, August 28, 2017

लौट आओ !

सूरज ढलने लगा,
रात ने स्याह ओढ़नी से
आसमां को ढ़क दिया
तब तुम आए !
मेरे हाथों में थमा दी
एक भारी भरकम पोटली,
पोटली में सितारे भरे थे !!!

पर मैंने तो जुगनू माँगे थे !
सितारों को सँभालना
मेरे बस की बात नहीं थी,
जुगनुओं को पकड़ पाना
तुम्हारे बस का नहीं था !!!

सितारों की रोशनी
मेरी आँखें ना सह सकीं !
जुगनुओं को ढूँढने का
जंगलीपन तुम्हे ना भाया !
कशमकश में फिसली
मेरे हाथों से,
रात भी, पोटली भी !!!

खुल गई भरम की गाँठ,
रात चुन गई, बिखरे सितारे !
जुगनू भी कहीं खो गए,
तुम भी लौट गए !
और मैं खोजती रह गई
तुम्हें भी, जुगनुओं को भी !!!

आसमां की आँखें लाल हैं
रोया होगा शायद,
या जागा होगा रात भर !
मेरे हाथों ने कँटीले पौधों से
जुगनू चुन लिए हैं,
लहूलुहान हो गए तो क्या ?

अब लौट आओ,
देखो ना !
मेरे लहूलुहान हाथों पर
मेंहदी का रंग है,
और मेहनत का भी !!!
लौट आओ !!!





Thursday, August 24, 2017

कबूल है हार !

उफ ! ये अभिमान !
प्रेम के दाता होने का
सर्वज्ञ ज्ञाता होने का !

गैरों को खुशियों की
भीख बाँटने का !
उड़ते पंछी के पर
काटने का !!!

फटेहाल सुदामा जाने
स्नेह की ही रीत !
बावरी मीरा तो गाए
प्रेम के ही गीत !!!

मन तेरा ना स्वीकारे
गर्व से भरा !!!
अश्रूबिंदु ना कभी
आँख से गिरा !!!

प्यार के खजाने का
मालिक हुआ,
अपने ही स्वत्व में
गाफिल हुआ !!!

भूल गया नेह के
सागर की गहराई !
भावनाओं की तुच्छ भेंट
ठोकर से ठुकराई !!!

अंत समय कौन क्या
साथ ले जाएगा ?
वक्त हम सभी को
यही सिखाएगा !!!

जीवन में प्रेम से
बड़ा नहीं उपहार !
प्रेम में कबूल है
मुझे अपनी हार !!!

Saturday, August 19, 2017

कैसे करूँ नव सृजन ?

आर्द्र नयन, शुष्क मन !
कैसे करूँ मैं नव सृजन ?

पूर्णता में रिक्तता,
अलिप्तता में लिप्तता,
विस्मृति में है स्मृति
जागृति में है शयन !
            कैसे करूँ मैं नव सृजन ?

जय में पराजय लगे,
राग में विराग है
है मूक मौन वक्तृता
हास्य में छुपा रुदन !
           कैसे करूँ मैं नव सृजन ?

विकास में विनाश है,
तृप्ति में भी प्यास है
वह मार्ग कौन सा कहाँ?
जिसका करूँ मैं अनुगमन !
           कैसे करूँ मैं नव सृजन ?

Wednesday, August 9, 2017

उम्मीद

अंधकार दूर हो,
उम्मीद हो उजास की !
विकास की घड़ी में बात
मत करो विनाश की।।

भिन्न-भिन्न, दूर-दूर,
हम रहे कई सदी,
दुश्मनों को देश की,
बागडोर सौंप दी ।

अब मिटा दो दूरियाँ,
जोड़ दो कड़ी-कड़ी
ना रहे कोई प्रथा,
भेदभाव से जुड़ी ।

अब नई हवा बहे,
एक प्राण-श्वास की !
विकास की घड़ी में बात,
मत करो विनाश की।।

हर किसान, हर जवान
की व्यथा का अंत हो
भूख की, अभाव की,
करूण कथा का अंत हो।

वक्त से पहले मिटें ना,
बचपने की मस्तियाँ
क्रूर पंजों में फँसें ना,
बुलबुलें औ' तितलियाँ ।

जुगनुओं से भी मिले,
इक किरण प्रकाश की !
विकास की घड़ी में बात
मत करो विनाश की ।।

Saturday, August 5, 2017

कैसे ?

जाने बदला क्यूँ रुख हवाओं का,
मिजाज़ रुत का भी है बदला सा !
प्यार का फलसफा सदियों से वही
वक्त के साथ हम बदलें कैसे ?

आज बच्चे सी मचलकर आती
ज़िद्दी यादों को थाम ले कोई !
द्वार पर दे रहीं दस्तक मन के,
लौट जाने को भी कहें कैसे ?

एक पंछी को रोज देखा है,
बातें करते हुए दरख्त के संग !
नाम दोनों के पाक रिश्ते का,
कोई पूछे तो बताएँ कैसे ?

हमने बादल से गुज़ारिश की है,
बरस जाए वो, जमीं पर दिल की!
कोई कदमों के निशां छोड़ गया,
अपने अश्कों से मिटाएँ कैसे ?

गर वो कह दें, कि अब चले जाओ
लौट जाएँगे उनकी महफिल से !
जान देकर वफ़ा निभा देंगे,
अब कहो, और निभाएँ कैसे ?

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Monday, July 31, 2017

बाबुल मेरे !

सावन के बहाने, बुला भेजो बाबुल,
बचपन को कर लूँगी याद रे !
बाबुल मेरे !
तेरे कलेजे से लग के ।।

नन्हें से पाँवों में, चाँदी की पायल,
पायल के घुँघरू, घुँघरू की रुनझुन !
रुनझुन मचलती थी, जब तेरे आँगन,
छोटी - छोटी खुशियों की बात रे !

बचपन को कर लूँगी याद रे !
बाबुल मेरे !
तेरे कलेजे से लग के ।।

अम्मा से कहना, तरसे हैं अँखियाँ,
अँखियों में सपने, सपनों में सखियाँ,
सावन के झूले, मीठी सी बतियाँ !
पीहर की ठंडी सी छाँव रे !

बचपन को कर लूँगी याद रे !
बाबुल मेरे !
तेरे कलेजे से लग के ।।

भैया को बहना की याद ना आए,
कैसे मगर, बहना बिसराए !
इक भैया मोरा, गया है बिदेसवा,
दूजे की नयनों को आस रे !

बचपन को कर लूँगी याद रे !
बाबुल मेरे !
तेरे कलेजे से लगके ।।
सावन के बहाने, बुला भेजो बाबुल !!!

Saturday, July 29, 2017

बात सितारों की करती हूँ !

चलती तो धरती पर हूँ
पर बात सितारों की करती हूँ !
पतझड़ है तो क्या ग़म है,
मैं आस बहारों की करती हूँ ।।

पिघल-पिघलकर ज्यों हिमराशि,
जलधारा बन बहती जाती
मधुर संदेशा वह पर्वत का,
खारे सागर को पहुँचाती ।
मैं भी कुछ नफरत के प्याले,
प्रीति-मधुर-रस से भरती हूँ !

पतझड़ है तो क्या ग़म है,
मैं आस बहारों की करती हूँ ।।

कहती हूँ मन की कुछ पीड़ा,
लिखती हूँ दिल की कुछ खुशियाँ।
जीवन की बगिया से चुनकर,
लाती हूँ गीतों की कलियाँ ।
नागफनी के जंगल में, मैं
रंग नज़ारों के भरती हूँ !

पतझड़ है तो क्या ग़म है,
मैं आस बहारों की करती हूँ ।।

Sunday, July 23, 2017

हर दौर गुजरता रहा

जिंदगी चलती रही,हर दौर गुजरता रहा,
इम्तहां पर इम्तहां ले, वक्त सरकता रहा ।

इस बार अलग था कुछ,अंदाजे-बयां उनका,
लफ्जों में छुपा खंजर,अब दिल में उतरता रहा।

आँखों में जो चमकते, टूटे वही सितारे,
हमराज मेरा, मेरे सब राज उगलता रहा ।

खुद नाव ने डुबोया जब बीच में दरिया के,
आया ना मेरा माझी, बस दूर से हँसता रहा ।

कच्चे घड़े सी ना मैं, छूते ही बिखर जाऊँ,
भट्टी में आफतों की, मजबूत दिल बनता रहा ।

कुछ तो दिया ना तूने ! चाहे दर्द हो या खुशियाँ,
हर पल तेरा शुकराना,दिल से निकलता रहा ।।
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Thursday, July 20, 2017

जिंदगी पर मत लिखो


जिंदगी पर मत लिखो अब,
जिंदगी रहने ही दो !
गर खुदा से प्यार ना हो,
बंदगी रहने ही दो !!!
        जिंदगी पर मत लिखो...
लाख मोड़े पैर,
चादर कम हमेशा ही रही।
बैल कोल्हू के बने
पर मार महँगाई गई !
मत बनो हमदर्द,
झूठी सादगी रहने ही दो !!!
        जिंदगी पर मत लिखो...
तुम मनाओ ईद, दीवाली !
सजाओ आशियाँ ।
हम तो बेघर,रास्तों पर,
रहते जैसे शहन्शाह !
बेख़ुदी में जी तो लेंगे,
बेख़ुदी रहने भी दो !
        जिंदगी पर मत लिखो...
इस जहाँ में जब से आए,
ढो रहे अपना सलीब ।
लोग बदले, दौर बदला,
बदला ना अपना नसीब !
मत दिखाओ और सपने
दिल्लगी रहने ही दो !!!
          जिंदगी पर मत लिखो...

Monday, July 17, 2017

बादल से संवाद

मानव :
"बादल, क्यों करते हो 
इतना पक्षपात ?
कहीं बाढ, दुर्भिक्ष कहीं,
क्यों मचा रहे उत्पात ?
माना, तुम झोली भर भरकर
नवजीवन ले आते हो,
लेकिन इन जीवनबूँदों को
सोच समझ तो बरसाओ।
सूखी धरती क्रंदन करती
पानी को ना तरसाओ ।

फटा कलेजा धरती माँ का,
दुष्कर हैं हालात !
बादल,क्यों करते हो 
इतना पक्षपात ?
ओ जल वितरण के ठेकेदार !
तुम पर भी छाया भ्रष्टाचार?

कहीं हरी चूनर पहने
इतराती है सावन तीज,
कहीं भाग्य को रोते हैं,
सूखे खेत, धरा निर्जीव !

अन्नदाता को अन्न के लाले,
कर्ज कराता आत्मघात ।
बादल,क्यों करते हो 
इतना पक्षपात ?"
बादल : ओ मानव,
सुनो जरा मेरे भी मन की,
पीड़ा मैं जानूँ जन जन की ...

मुझ पर क्यों इल्जाम लगाते,
तुम देखो अपनी करतूत !
कोप प्रकृति का महाभयंकर,
अब तुमको मिल रहा सबूत ।

नदिया सागर किए प्रदूषित
नहीं सुना वृक्षों का क्रंदन,
विषवृक्ष लगाकर स्वयं यहाँ,
पाना चाहते हो चंदनवन ?

तुमने अपने पैरों पर,
खुद किया कुठाराघात...
मानव, किया कुठाराघात !
हुए अब बेकाबू हालात !!!"




Saturday, July 15, 2017

अर्धसत्य

'''अर्धसत्य'''
*********
जाने किसने तुम्हें यह
उपाधि दे दी -
'सत्यम,शिवम,सुंदरम'
कह दिया तुम्हें !
तुम सत्य भी हो
और सुंदर भी ?

सत्य हमेशा ही सुंदर हो,
ये जरूरी तो नहीं !
फिर तुम सत्य कैसे ?

सत्य के घिनौने, 
वासनामय और भूखे-नंगे 
रूपों का क्या ?
उनमें तुम्हारी कल्पना करूँ,
क्या सह पाओगे तुम ?

तुम तो मधुर हो ना !
"मधुराधिपते अखिलं मधुरम" !
फिर तुम सत्य कैसे ?

हर सत्य तो मधुर नहीं होता
अधिकतर तो कड़वा ही होता है!
तुम कटु सत्य हो गए,
तो मीठी बंसी कैसे बजाओगे ?

कैसे समझूँ मैं तुम्हें ?
कैसे जानूँ ?
मन घुट रहा है सवालों से !
अच्छा, इतना तो बता दो,
तुम्हें सत्य कैसे कहूँ ?
और 'अर्धसत्य' कहूँ,
तो मंजूर होगा क्या तुम्हें ?



Saturday, July 8, 2017

स्वप्न-गीत

स्वप्न-गीत--
कभी कभी एक गीत
मेरे सपनों में आता है
बिखेरता है गुलाबों की खुशबू,
मन के हर कोने में !
बाँसुरी की मीठी तान सा
कानों में शहद घोल जाता है !

छा जाता है बादलों की तरह
उदास नयनों पर !
फिर पता ही नहीं चलता,
नयन बरस रहे हैं या बादल
भीगा मन सिहरता है,
गीत हँस देता है,झाँककर
मेरी आँखों में !

समेट लेता है मुझे अपनी
हथेलियों में बड़ी नज़ाकत से,
जैसे चिड़िया छुपा लेती है
परों में अपने बच्चे को !
रख लेता है मुझे दिल के करीब
एक नर्म अहसास की तरह !

चाँद की मद्धिम रोशनी में
जादू के पंख लगाए,
किसी फरिश्ते की तरह
गीत उतरता है आसमां से
और थामकर हाथ मेरा
साथ चलने को मजबूर कर देता है !!!


Monday, July 3, 2017

इंद्रधनुष


इंद्रधनुष,
दे दो इजाजत,
आज तुम दे दो इजाजत !
अंजुरि भर रंग तुम्हारे
अपनी पलकों में सजा लूँ
और सब बेरंग सपने,
मैं जरा रंगीन कर लूँ !
श्वेत श्यामल जिंदगी में
तितलियों के रंग भर लूँ !

इंद्रधनुष,
आज रुक जाओ जरा,
दम तोड़ती, बेजान सी
इस तूलिका को,
मैं रंगीले प्राण दे दूँ,
रंगभरे कुछ श्वास दे दूँ !
पूर्ण कर लूँ चित्र सारे,
रह गए थे जो अधूरे !

इंद्रधनुष,
आज कुछ ऐसा करो ना !
रंग तुम्हारे हों असीमित
शब्द मेरे हों अपरिमित
हर नई संवेदना को
इक नया मैं रंग दे दूँ !
आज अपनी कलम को
मैं तुम्हारा संग दे दूँ !

इंद्रधनुष,
आज तुम तोड़ो प्रथा और
गगन से उतरो जमीं पर !
अनछुए रंगों में लिपटूँ ,
मैं तुम्हारे गले लगकर
मुस्कुरा लूँ,आज जी भर !
तुम अगर दे दो इजाजत !

इंद्रधनुष
आज तुम दे दो इजाजत !

Saturday, June 17, 2017

बंद दरवाजों की संस्कृति


यह बंद दरवाजों की संस्कृति है,
यहाँ बड़ी शांति है !
महानगरों की ऊँची अट्टालिकाएँ
और डिबिया से घर !

नहीं नजर आती,
आचार, पापड़ और बड़ियाँ
सुखाती, उठाती, 
चाची,ताई और भाभियाँ ।
नहीं जगाता कोई किसी को,
भरी दोपहरी में !

'दीदी, खरी कमाई के पैसे दो,
भाभी, मोजे के कितने फंदे?
कितने उल्टे, कितने सीधे ?
बेटी, ये मेरी चिट्ठी पढ़ दे'

गुम हो गई हैं वे आवाजें,
वो ठहाकेदार हँसी मजाक,
वो बच्चों की चिल्लपों,
यहाँ बड़ी शांति है !

सिर पर रखी टोकरी में
देवी-यल्लम्मा को बिठाए,
वो बूढ़ी याचिका,
एक मुट्ठी चावल के बदले
मिलने वाली करोड़ों की दुआएँ ...
"देवा ! माझ्या मुलीला सुखी राहू दे !"

मोर पंख की टोपी लगाए,
घुंघरू और खंजड़ी की ताल पर
"यमुनेच्या तीरी आज पाहिला हरी"
यह भजन गाता वासुदेव
वे भी यहाँ नहीं आते,
यहाँ बड़ी शांति है !

रोबोट से यंत्रचालित
नापकर मुस्कुराते
तौलकर बोलते,
आत्मकेंद्रित,सभ्य और शालीन,
लोगों की यह बस्ती है.
यहाँ बड़ी शांति है 

अंतर्जाल के आभासी रिश्तों में
अपनापन ढूँढ़ने की कोशिश,
सन्नाटे से उपजता शोर
उस शोर से भागने की कोशिश !

अशांत मनों की नीरव शांति !
यह महानगरों की
फ्लैट संस्कृति है,
बंद दरवाजों की संस्कृति है,
यहाँ बड़ी शांति है !


Monday, June 12, 2017

बरस बीत गया....

पिछले वर्ष 12जून 2016 को मैंने पहली पोस्ट "बंदी चिड़िया"के साथ इस ब्लॉग की शुरूआत की थी।
  वास्तव में इससे पहले मैंने ब्लॉग लेखन के बारे में सुना भर था । कालेज के जमाने से लेखन का शौक था। पापा को भजनों का शौक रहा। अच्छा गाते भी थे और हारमोनियम भी बजाते थे। भजनों से भरी कई डायरियाँ पापा के पास अभी भी हैं। भजन संग्रह का उन्हें काफी शौक रहा । कुछ भजन पापा खुद भी लिखते थे।
उनकी देखादेखी हम बहनों ने भी कई भजन लिखे । मैं कविताएँ एवं गजल जैसा कुछ लिखती रही, किंतु छुपाकर । घर के रूढ़िवादी माहौल में उन्हें बाहर लाने का अर्थ था - अपनी पढ़ाई लिखाई बंद करवा कर घर बैठ जाना ।
  विवाह के बाद तो पारिवारिक जिम्मेदारियों में लिखने का अवकाश ही नहीं मिल पाता था । वाचन में रुचि एवं भाषा की शिक्षिका होने से साहित्य से जुड़ाव बना रहा ।
 लिखने की दूसरी पारी की शुरूआत तीन वर्ष पूर्व अपने पुत्र के अठारहवें जन्मदिन पर एक कविता से की । वह कविता थी - माँ की चिट्ठी । उसके बाद 'बंदी चिड़िया' एवं अन्य कविताएँ लिखीं । कुछ स्थानीय अखबारों में प्रकाशित भी हुई किंतु प्रकाशन को गंभीरता से ना लेते हुए मैंने शौकिया लेखन ही जारी रखा ।
    पिछले वर्ष बहन ने हमारे शहर की ही एक गुजराती लेखिका के ब्लॉग की लिंक भेजी। उसके बाद से मुझे भी लगने लगा कि मैं भी अपना ब्लॉग बनाकर अपनी अभिव्यक्ति को सबके साथ साझा करूँ।  ब्लॉग बनाने की तकनीकी जानकारी शून्य थी। यू ट्यूब से ही सीखकर बनाया था । जैसा बन पाया था उसी पर कुछ पुरानी व कुछ नई रचनाओं को पोस्ट करना शुरू किया।
कहते हैं ना कि 'जहाँ चाह, वहाँ राह '..... दुनिया में आज भी अच्छे लोग हैं और सीखने की चाह रखने वालों के लिए कदम कदम पर शिक्षक हैं । ऐसे ही एक मार्गदर्शक और शुभचिंतक की मदद से मेरे ब्लॉग को यह नया स्वरूप प्राप्त हुआ और एक प्यारा सा नया नाम भी मिला -- 'चिड़िया'....
एक वर्ष में इस ब्लॉग पर 80 पोस्ट प्रकाशित हो चुकी हैं जिसके लिए  मैं अपने मार्गदर्शक की बहुत-बहुत शुक्रगुजार हूँ ।
 आप सभी पाठकों और ब्लॉगर मित्रों ने मेरी उम्मीद से भी ज्यादा स्नेह और प्रोत्साहन दिया है जिससे मेरी लेखनी को एक नया जीवन मिला है । मैं तहेदिल से आप सबकी आभारी हूँ ।

अंत में अपनी ही एक कविता की पंक्तियाँ....
"जिंदगी हर पल कुछ नया सिखा गई,
ये दर्द में भी हँसकर जीना सिखा गई...
काँटे भी कम नहीं थे गुलाबों की राह में,
खुशबू की तरह हमको बिखरना सिखा गई...
अच्छाइयों की आज भी कदर है जहाँ में,
दामन में दुआओं को ये भरना सिखा गई..."

Saturday, June 10, 2017

एक और बचपना - 'बकबक'

लिखना-विखना खास नहीं कुछ,
ये तो सारी बकबक है...
सुनने को तैयार नहीं तुम,
किसे सुनाऊँ, उलझन है !!!

मेरी बकबक सुन-सुनकर तुम,

बोर हो गए ना आखिर ?
चिट्ठी लिखकर 'मेल' करूँगी,
पढ़ लेना जब चाहे दिल....
(अरे बाबा, वो मेल मिलाप वाला
'मेल' नहीं, Mail - मेल ! )

फिर भी व्यस्त हुए तो कहना --

"रोज-रोज क्या झिकझिक है ?"
लिखना विखना खास नहीं कुछ,
ये तो सारी बकबक है !!!

मेरी बकबक में मेरे,

जीवन की करूण कहानी है
गुड़िया, चिड़िया, तितली है,
इक राजा है इक रानी है !!!
( याद आया कुछ ? )

परीदेश की राजकुमारी,

स्वप्ननगर का राजकुमार
हाथी, घोड़े, उड़नतश्तरी,
कई शिकारी, कई शिकार !

कितना कुछ कहना है मुझको,

लेकिन वक्त जरा कम है !
सुनने को तैयार नहीं तुम,
किसे सुनाऊँ, उलझन है !!!

ये खाली पन्ने सुनते हैं,

मेरे मन की सारी बात
बोर ना होते कभी जरा भी,
चाहे दिन हो, चाहे रात !

इन पर आँसू भी टपकें तो,

ये कहते हैं - रिमझिम है !
कितना कुछ कहना है मुझको,
लेकिन वक्त जरा कम है !!!

लिखना-विखना खास नहीं कुछ....


Thursday, June 1, 2017

फासला क्यूँ है ...



ज़िंदगी तेरे-मेरे बीच
फासला क्यूँ है ?
तुझको पाने का, खोने का,
सिलसिला क्यूँ है ?

अपने जज्बातों को
दिल में ही छुपाए रखा,
और हर आह को
ओठों में दबाए रखा !
फिर जमाने को मेरी,
खुशियों से शिकवा क्यूँ है ?

मेरे सीने में धड़कती है
तू धड़कन बनकर,
और कदमों से लिपट
जाती है, बंधन बनकर !
मेरी तन्हाई में, यादों का
काफिला क्यूँ है ?

जिस्म मिट जाए, मगर
रूह ना मिट पाएगी,
वो तो खुशबू है,
फिज़ाओं में बिखर जाएगी !
फिर ये दरिया, मेरी आँखों से
बह चला क्यूँ है ?

ज़िंदगी तेरे- मेरे बीच
फासला क्यूँ है ?

Friday, May 26, 2017

नुमाइश करिए

दोस्ती-प्यार-वफा की, न अब ख्वाहिश करिए
ये नुमाइश का जमाना है नुमाइश करिए ।

अब कहाँ वक्त किसी को जनाब पढ़ने का,
इरादा हो भी, खत लिखने का, तो खारिज करिए ।

अपनी मर्जी से चलें वक्त, हवा और साँसें,
कैद करने की इन्हें, आप न साजिश करिए ।

सूखे फूलों को भला कौन खिला सकता है,
आप उन पर भले ही, प्यार की बारिश करिए ।

यहाँ गुनाहे - मोहब्बत की सजा उम्रकैद है,
दूर रहने की इस गुनाह से कोशिश करिए ।

जिंदगी की अदालत फैसले बदलती नहीं,
अब कहीं और रिहाई की गुजारिश करिए।।
***

Sunday, May 21, 2017

माटी

      *माटी*
जब यह तन माटी हो जाए,
काम किसी के आए तो !
माटी में इक पौधा जन्मे,
कलियाँ चंद, खिलाए तो !

सूरज तपे, बनें फिर बादल,
फिर आए वर्षा की ऋतु,
बूँदें जल की, माटी में मिल,
माटी को महकाएँ तो !

माटी के दो बैल बनें,
औ' माटी के गुड्डे - गुड़ियाँ,
खेल - खिलौने माटी के,
बालक का मन बहलाएँ तो !

माटी में वह माटी मिलकर,
कुंभकार के चाक चढ़े,
माटी का इक कलश बने,
प्यासों की प्यास बुझाए तो !

किसी नदी की जलधारा से,
मिलकर सागर में पहुँचे,
सागर की लहरों से मिलकर,
क्षितिज नए पा जाए तो !

उस माटी के कण उड़कर,
बिखरें कुछ तेरे आँगन में,
तेरे कदमों को छूकर,
वह माटी भी मुस्काए तो !!!

Friday, May 12, 2017

तब गुलमोहर खिलता है !

 तब गुलमोहर खिलता है !
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फूले पलाश झर जाते हैं,
टेसू आँसू  बरसाते हैं,
दारुण दिनकर की ज्वाला में,
जब खिले पुष्प मुरझाते हैं,
सृष्टि होती आकुल व्याकुल,
हिमगिरी का मुकुट पिघलता है...
तब गुलमोहर खिलता है !!!

जिद्दी बच्चे सी मचल हवा,
पैरों से धूल उड़ाती है,
तरुओं के तृषित शरीरों से,
लिपटी बेलें अकुलाती हैं,
जब वारिद की विरहाग्नि में,
धरती का तन मन जलता है...
तब गुलमोहर खिलता है !!!

निर्लिप्त खड़ा यूँ उपवन में,
ज्यों कोई दुःख ना कोई सुख,
रक्तिम फूलों की आभा से,
लाल हुआ है सुंदर मुख !
जब कोकिल की मीठी वाणी का,
रस पेड़ों पर झरता है...
तब गुलमोहर खिलता है !!!

तपती धरती, तपता अंबर,
प्रकटी है अग्नि, फूल बनकर,
सिंदूर सजाए सुहागन सा
तेजोमय यह सौंदर्य प्रखर !
नदिया के सूने तट कोई ,
जब राह किसी की तकता है...
तब गुलमोहर खिलता है !!!