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Tuesday, November 14, 2017

बालदिवस के अवसर पर

सुबह-सुबह मुझसे जैसे ही मिलते हो तुम,
बगिया में खिलते से फूल लगते हो तुम।

पक्षियों की भाँति चहचहाते रहते हो तुम,
हरदम दिल के करीब रहते हो तुम ।
पक्षी उड़ें आसमान, आप दौड़ें कॉरीडोर,
लगभग दोनों ही समान लगते हो तुम ।।
सुबह-सुबह मुझसे....

यूनीफॉर्म के नाम पर, एकदम 'कूल' हो,
लाइट पंखा अक्सर, बंद करना जाते भूल हो।
रीडिंग के नाम पे हो जाते आप बोर हो,
मेरे लिए फिर भी, पतंग वाली डोर हो।।

चलते पीरियड में जाने कहाँ खोए रहते हो,
पीटी जाने के ही तुम सपने सजाते हो।
भोले बन जाते हो टीचर की नजर पड़ते ही,
छुट्टी का नोटिस देख, फूले ना समाते हो ।।

टीचर पढ़ाने की जैसे ही शुरूआत करें,
आप अपने मित्रों से, बातों की शुरूआत करें।
अनगिनत बहाने-कभी पेट,कभी सिरदर्द
कितने ही दर्दों की दुकान लगते हो तुम !!!
सुबह-सुबह मुझसे.....

दर्दों का कोई रंग-रूप नहीं होता है,
वैसे ही कॉपी का काम पूरा नहीं होता है।
सबमिशन की डेट कभी सुनते नहीं हो आप,
अदालत में चलते मुकदमे की भाँति आप
तारीखों पे तारीखें बढ़ाते चले जाते हो,
फिर भी मेरे मन को बहुत ही लुभाते हो ।।

आज पेन नहीं, कल कॉपी नहीं होती है,
स्कूल डायरी बैग में, शायद ही कभी होती है।
पूछूँ जो किताब, बोलें - I forgot mam,
कहके, मेरे बीपी को बढ़ाते चले जाते हो ।

कंप्यूटर के मामले में टीचर्स से आगे हो तुम,
स्मार्टबोर्ड चलाना, टीचर्स को सिखाते हो।
चाहे जितनी डाँट खाओ, टीचर से साल भर,
'हैप्पी टीचर्स डे' फिर भी विश करके जाते हो।

आखिर तो बच्चे हो, दिल के बड़े सच्चे हो,
मेरे दिल में छुपी हुई माँ को जगाते हो।
ज़िंदगी में किसी भी मुकाम पर पहुँच जाओ,
शिक्षकों को अपने, तुम कभी ना भुलाते हो।

तुम मेरे मन को, बहुत ही लुभाते हो !
तुम मेरे मन को, बहुत ही लुभाते हो !!
सुबह- सुबह मुझसे......
**********************************
(यह कविता मेरी नहीं है। किसकी है, मैं नहीं जानती। बच्चों को सुनाने के लिए अच्छी कविताओं की खोज में मैं सदा ही रहती हूँ, ये जानकर मेरी एक सहेली द्वारा यह मुझे प्रेषित की गई । इसके आखिरी दो छंद मैंने जोड़े हैं और इसे सुनाने पर बच्चे बहुत ज्यादा खुश हुए। शायद इसलिए कि एक तो इसमें कोई नसीहत नहीं दी गई है और दूसरा यह कि यह वैसी हिंदी में है, जैसी बच्चे बोलते हैं आजकल । जो भी हो, बच्चों के चेहरे पर हँसी तो आई। कविता के रचयिता जो भी हों, मैं सारा श्रेय उन्हें देती हूँ। आभार ।)

Monday, November 13, 2017

एकाकी मुझको रहने दो

एकाकी मुझको रहने दो.
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पलकों के अब तोड़ किनारे,
पीड़ा की सरिता बहने दो,
विचलित मन है, घायल अंतर,
एकाकी मुझको रहने दो।।

शांत दिखे ऊपर से सागर,
गहराई में कितनी हलचल !
मधुर हास्य के पर्दे में है,
मेरा हृदय व्यथा से व्याकुल
मौन मर्म को छू लेता है,
कुछ ना कहकर सब कहने दो !
एकाकी मुझको रहने दो।।

कोमल कुसुमों में,कलियों में,
चुभते काँटे हाय मिले,
चंद्र नहीं वह अंगारा था,
जिसको छूकर हाथ जले,
सह-अनुभूति सही ना जाए
अपना दर्द स्वयं सहने दो !
एकाकी मुझको रहने दो।।

यादों के झरने की कलकल
करती है मन को विचलित !
क्या नियति ने लिख रखा है,
जीवन क्यूँ यह अभिशापित ?
गाए थे हमने जो मिलकर 
उन गीतों को अब रोने दो !
एकाकी मुझको रहने दो ।।

पलकों के अब तोड़ किनारे,
पीड़ा की सरिता बहने दो, !
विचलित मन है, घायल अंतर,
एकाकी मुझको रहने दो।।

Saturday, November 11, 2017

पुस्तक समीक्षा - "मन दर्पण"



पुस्तक समीक्षा

रचना – मन दर्पण.
रचनाकार – माड़भूषि रंगराज अयंगर.
प्रकाशक – बुक बजूका पब्लिकेशन्स, कानपुर.
मूल्य – रु. 175 मात्र ( डाक खर्च अलग).
कैसे प्राप्त करें – नीचे दिए लिंक पर क्लिक करके ऑर्डर किया जा सकता है.
ISBN   : 978-81-933482-3-9                       
पुस्तक ई बुक व पेपरबैक दोनों रुपों में उपलब्ध है.

प्रस्तुत रचना संग्रह में लेखक की 65 रचनाएँ हैं जिनमें 5 गद्य एवं 60 कविताओं का समावेश है।

प्रतीत होता है कि कविता लेखक की प्रिय विधा रही है। हर प्रकार के विषय को उनकी सशक्त लेखनी ने स्पर्श किया है।

'रामायण' कविता में महाकाव्य रामायण के सार को चंद पंक्तियों में प्रस्तुत करने का सराहनीय प्रयास है।

'मोती' एवं'सुख का मान' कविताएँ शब्दचयन व विशिष्ट शिल्पसौंदर्य को लिए अनूठी हैं।

'परमगति कबूतर की' और 'बापू फिर मत आना' व्यंग्य की दृष्टि से विशेष उल्लेखनीय हैं । कई जगह व्यंग्य के तीर मर्मस्थान को भेदकर गहरे चिंतन को विवश कर देते हैं, यथा-

"हिंदी के वास्ते सब एक कीजिए,
कुछ नहीं तो इंडिया गेट पर एजिटेट कीजिए"
( गुलामी )

"पैसा जुबानी नहीं समझता
ये सिर चढ़कर बोलता है, और
कभी कभी चौराहे पर
कपड़े भी खोलता है !"
( पैसा और पोटली )


अनेक कविताओं में वे गंभीर दार्शनिक सी बातें कहते हुए सीख व संदेश सहजता से दे जाते हैं-
"पानी में हवा का बुलबुला
अपनी क्षणिकता जीवन को दे गया है"
( ज्ञान का पुनर्दान )

"ब्रह्मा ने बीज सृष्टि के लाए थे छाँटकर
पर मिल गए अंजाने में सारे एक संग"
(रंगबिरंगी सृष्टि)

"भेड़िए ही घूमते हैं, आज मानव वेश में
इंसानियत परिवर्तित हुई,क्लेश और द्वेष में"
(मेरा भारत महान)

विशेष बात यह है कि हास्य व्यंग्य,हाजिरजवाबी एवं विनोद का पुट होने से कहीं भी नीरसता या बोरियत नहीं होती-
"शायद मरघट पर
आज के गीत बजाए जाएँ तो
मुर्दे भी खड़े होकर नाचने लगेंगे"
(मुर्दा नाचा)

"भीड़ से कतराए जो
उनको ये मंशा दीजिए
जाकर कहीं एवरेस्ट पर
एक कमरा लीजिए"
(छींटाकशी)

प्रेम और श्रृंगार की कविताएँ जैसे - 'बातें-यादें', धड़कन, सिंदूर मेरे, रो जाता हूँ, आदि अनेक कविताओं में अनुराग के कोमल, नम, भावुक, सुंदर अहसासों को समेटे हुए हैं -
"बिन तेरे बात मैं ना कर पाऊँ
होठ बस बंद-बंद रहते हैं
याद में तेरी जो कह पाऊँ
सब उसे छंद काव्य कहते हैं"
(छंद-काव्य)

'रिश्ते-नाते, घरौंदा बाबूजी का, बहना का ब्याह, मेरे अपने, लाड़ली जैसी कविताएँ परिवार एवं रिश्ते-नातों में लेखक की प्रगाढ़ आस्था का साक्षात्कार कराती हैं ।

"काश ! अपनों पर तुम भरोसा करो
या उन्हें अपना कहना ही तुम छोड़ दो"
(मेरे अपने)

ममता और वात्सल्य से भरा कवि हृदय छलकता दिखाई देता है 'गुड़िया, हश्र, बहना का ब्याह' जैसी कविताओं में....

'एक चिट्ठी माँ के नाम' तो मातृप्रेम का पुख्ता दस्तावेज ही कही जा सकती है ।

इनके अलावा 'एक पौधा, एक और पौधा, चंदामामा, बरसात, फूलों की बात, गुड़िया जैसी अनेक कविताएँ हैं जिनका बेहतरीन बालसाहित्य में एवं पाठ्यपुस्तकों में समावेश किया जा सकता है।

गद्य की बात करें तो 'द्वंद्व अभी जारी है' रोचक कहानी है जिसमें प्रेम में असफल प्रेमी के मन का द्वंद्व उभरकर सामने आता है ।
एकांतर कथा में रोचक कहानी के माध्यम से पानी के अपव्यय की पोल खोली गई है ।

'प्रतीकात्मकता'सशक्त लेख है जो प्रतीकरूप में विशेष दिनों को मनाने की वास्तविक सच्चाई और दिखावे का पर्दाफाश करता है ।

'राष्ट्रीय पर्व' एवं 'रिटायरमेंट' नागरिकों के जागरूक एवं सजग होने पर बल देते अच्छे आलेख हैं ।

भाषा पर पकड़, सरलता, सुबोधता, भावगम्यता और लेखक की स्पष्ट विचारधारा का दर्शन प्रत्येक रचना में होता है ।

स्पष्ट-सुंदर छपाई, आकर्षक मुखपृष्ठ एवं ना के बराबर त्रुटियाँ - पुस्तक का दूसरा सबल पक्ष हैं।
सारांशतः पुस्तक पठनीय एवं संग्रहणीय है ।
........
यह समीक्षा आदरणीय अयंगर जी की अनुमति से लिखी गई है. 

लावारिस लाश

मौन की सड़क पर
पड़ी रही एक रिश्ते की
लावारिस लाश रात भर !!!

आँसुओं ने तहकीकात की,
राज खुला !
किसी ने जिद और अहं का
छुरा भोंककर
किया था कत्ल उस रिश्ते का !

नंगी लाश लावारिस
पड़ी रही बेकफन रात भर !
कौन था उसका,
जो करता अंतिम संस्कार
सम्मान के साथ !

पोस्टमार्टम यानि चीरफाड़
जरूरी थी, हुई ।
हत्या आखिर हत्या है,
इंसान की हो या रिश्ते की !

दिन के पहले पहर
संवेदनाओं का चंदा इकठ्ठा किया
एक भले आदमी ने !
जैसे तैसे हासिल किया लाश को
तैयारी हो गई अंतिम यात्रा की !

सवाल अब भी था,
दफनाएँ या जलाएँ ?
कैसे पता चले इस रिश्ते का धर्म ?
तभी लाश कराही,
हैरान थे सब, एक आवाज आई -

"मैं मुहब्बत हूँ, दफना दो,
मैं प्रेम हूँ, जला दो !
निर्णय नहीं कर पाओ तो
मुझे नदी में बहा दो !
मेरे कुछ कण जल में मिलकर
धो सकें उसके कदमों को
जिसने मेरा कत्ल किया !
कह देना इतना ही उससे जाकर
मैंने उसे माफ किया !
मैंने उसे माफ किया !!
मैंने उसे माफ किया !!!"







Tuesday, November 7, 2017

जब शरद आए !


ताल-तलैया खिलें कमल-कमलिनी
मुदित मन किलोल करें हंस-हंसिनी !
कुसुम-कुसुम मधुलोभी मधुकर मँडराए,
सुमनों से सजे सृष्टि,जब शरद आए !!!

गेंदा-गुलाब फूलें, चंपा-चमेली,
मस्त पवन वृक्षों संग,करती अठखेली !
वनदेवी रूप नए, क्षण-क्षण दिखलाए,
सुमनों से सजे सृष्टि,जब शरद आए !!!


परदेसी पाखी आए, पाहुन बनकर,
वन-तड़ाग,बाग-बाग, पंछियों के घर !
मुखरित, गुंजित, मोहित,वृक्ष औ' लताएँ,
सुमनों से सजे सृष्टि, जब शरद आए !!!

लौट गईं नीड़ों को, बक-पंक्ति शुभ्र,
छिटकी नभ में, धवल चाँदनी निरभ्र !
रजनी के वसन जड़ीं हीरक कणिकाएँ,
सुमनों से सजे सृष्टि, जब शरद आए !!!


Monday, November 6, 2017

नग़मों का आना जाना है !

बुननी है फिर आज इक ग़ज़ल
लफ्जों का ताना - बाना है !
तेरे दिल से मेरे दिल तक
नग़मों का आना जाना है !

कह भी दो, दिल की दो बातें
प्यार सही, तकरार सही !
बातों-बातों में बातों से
पागल दिल को बहलाना है !

वक्त ज़िंदगी कितना देगी,
तुम जानो ना मैं जानूँ !
सपनों में आकर मिल लेना
कुछ लम्हों का अफसाना है !

किससे सीखा ओ जादूगर,
पढ़ना अँखियों की भाषा  ?
खामोशी में राज़ नया कुछ
हमको तुमसे कह जाना है !

रूठ सको तो रूठे रह लो,
नहीं मनाने आएँगे अब !
इतना कह दो बिन बादल के
सावन को कैसे आना है ?

तेरे दिल से मेरे दिल तक
नग़मों का आना जाना है !

Friday, November 3, 2017

बोल, क्या नहीं तेरे पास ?

बोल, क्या नहीं तेरे पास ?

यह मनु-तन पाया
हर अंग बहुमूल्य,
सद्गुणों से बन जाए
तू देवों के तुल्य !
वाणी मणिदीप है,
तो बुद्धि है प्रकाश !!!

बोल क्या नहीं तेरे पास ?

देख उन सजीवों को
तू जिनसे बेहतर !
घुट घुटकर जीना है,
मरने से बदतर !
खींचकर निकाल दे,
मन की हर फाँस !

बोल, क्या नहीं तेरे पास ?

मानव का जन्म मिला
सबसे अनमोल,
हीरों को कंकड़ों संग
तराजू ना तोल !
सोच जरा, समझ जरा
क्यों है निराश ?

बोल, क्या नहीं तेरे पास ?

उठ सत्वर ! कर्म कर,
आलस को त्याग कर,
तपता, जलता है ज्यों
जगहित दिनकर !
कुछ स्व का, कुछ पर का,
किए जा विकास !

बोल, क्या नहीं तेरे पास ?





Sunday, October 22, 2017

खामोशियाँ गुल खिलाती हैं !

रात के पुर-असर सन्नाटे में
जब चुप हो जाती है हवा
फ़िज़ा भी बेखुदी के आलम में
हो जाती है खामोश जब !
ठीक उसी लम्हे,
चटकती हैं अनगिनत कलियाँ
खामोशियाँ गुल खिलाती हैं !!!

दर्द की बेपनाही में अक्सर
दिल चीखकर रोता है बेआवाज़
पथराई नजरों की जुबां भी
हो जाती हैं खामोश जब !
ठीक उसी लम्हे,
फफककर फूटता है आबशार
खामोशियाँ आँसू बहाती हैं !!!

किसी की खामोशी का सबब
जानकर, अनजान बनता है कोई
इश्किया गज़लों के तमाम अशआर
हो जाते हैं खामोश जब !
ठीक उसी लम्हे,
बिखरता है कोई मासूम दिल
खामोशियाँ दिल तोड़ जाती हैं !!!
--_---_---_---_---_---_---_---

*( अशआर = शे'र का बहुवचन, बेखुदी = बेसुधी,
फ़िज़ा = प्रकृति, आबशार = झरना, गुल = पुष्प, 
सबब = कारण, पुर-असर = असरदार )*


Tuesday, October 17, 2017

एक दीप !

एक दीप, मन के मंदिर में,
कटुता द्वेष मिटाने को !
एक दीप, घर के मंदिर में
भक्ति सुधारस पाने को !

वृंदा सी शुचिता पाने को,
एक दीप, तुलसी चौरे पर !
भटके राही घर लाने को,
एक दीप, अंधियारे पथ पर !

दीपक एक, स्नेह का जागे
वंचित आत्माओं की खातिर !
जागे दीपक, सजग सत्य का
टूटी आस्थाओं की खातिर !

एक दीप, घर की देहरी पर,
खुशियों का स्वागत करने को !
एक दीप, मन की देहरी पर,
अंतर्बाह्य तिमिर हरने को !

दीप प्रेम का रहे प्रज्ज्वलित,
जाने कब प्रियतम आ जाएँ !
दो नैनों के दीप निरंतर
करें प्रतीक्षा, जलते जाएँ !
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Friday, October 13, 2017

मेरे स्नेही सागर !

मेरे स्नेही सागर !
दुनिया तुम्हें खंगालती होगी
रत्नों की चाह में,
गोताखोर लगाते होंगे डुबकियाँ
मोतियों की आस में !

किंतु मैं तो दौड़ी आती हूँ
सिर्फ और सिर्फ तुम्हारे लिए !
मुझे तुम्हारे मुक्ता मणियों की
ना आस है ना चाव !

उमड़-उमड़ कर, पार करती
पर्वतों, बीहडों, जंगलों को
राह में मिले रोड़े, पत्थर, काँटे
और कितने ही गंदे नाले !
घायल अंतर, प्रदूषित तन की
भेंट लिए चली आई हूँ !

जानती हूँ मैं !
एक तुम ही हो, जिसमें शक्ति है
मेरा आवेग सँभालने की,
मुझे मुक्त करने की, इस भार से
जो ढोती आई हूँ मैं
युगों - युगों से !

कौन कहता है कि बंद हो गई है
मैला ढोने की पंरपरा !
मैं तो अब भी ढो रही हूँ !!!
यदि लोगों का बस चलता,
तो मुझे भी अछूत कह देते !

हजारों मील दूर से,
सम्मोहित सी, मार्गक्रमण करती
मानव के हर अत्याचार को झेलती,
तुममें समा जाने को अधीर,
मैं बहती रही ! बहती रही !

सुनो प्रियतम,
तुमसे मिलकर बाँध टूटा,
बहे झरझर अश्रू के निर्झर !
शायद इसीलिए खारे हुए तुम !
खारेपन की, आँसुओं की
सौगात भी सहेज ली ?

मेरे स्नेही सागर !
मैं तो दौड़ी आती हूँ
सिर्फ और सिर्फ तुम्हारे लिए !











Thursday, October 5, 2017

चाँद कमल सा खिला !


रात की नीली नदी में
चाँद कमल-सा खिला !!!

झूमकर चली पवन,
विहँस पड़ी दिशा-दिशा,
चढ़ अटारी क्षितिज की,
नाच उठी ज्योत्सना !

रात की नीली नदी में
चाँद कमल-सा खिला !!!

चंचला बिजुरी दमककर
छिप गई घन के हृदय में
झाँकते नक्षत्रगण कुछ,
जुगनुओं से टिमटिमा !

रात की नीली नदी में
चाँद कमल-सा खिला !!!

आज आधी रात में
पपीहरा बेचैन क्यों ?
तीर किसकी पीर का,
उर में इसके उतर गया !

रात की नीली नदी में
चाँद कमल-सा खिला !!!

Wednesday, October 4, 2017

जिंदगी हर पल कुछ नया सिखा गई....



जिंदगी हर पल कुछ नया सिखा गई,
ये दर्द में भी हँस कर जीना सिखा गई ।

जब चुप रहे, तो जिंदगी बोली कि कुछ कहो
जब बोलने लगे तो, चुप रहना सिखा गई ।

यूँ मंजिलों की राह भी आसान नहीं थी,
बहके कदम तो फिर से सँभलना सिखा गई ।

काँटे भी कम नहीं थे गुलाबों की राह में,
खुशबू की तरह हमको बिखरना सिखा गई ।

अच्छाइयों की आज भी कीमत है जहाँ में,

दामन को दुआओं से ये भरना सिखा गई ।।

Monday, October 2, 2017

प्रार्थना


हार से बोझिल पगों को ,
जीत का आह्वान देना !
सोच को मेरी, प्रभु !
सत्प्रेरणा का दान देना ।।

प्रेम देना, स्नेह देना,
किंतु मत अहसान देना !
सत्य की कटु औषधि को,
मधुरता, अनुपान देना ।।

भीत, आशंकित हृदय की,
आस्था को मान देना !
पीड़ितों को, शोषितों को,
करूणा का वरदान देना ।।

आत्मबल को खो चुके जो,
उन्हें आत्माभिमान देना !
काँपती दीपक की लौ को,
भोर तक परित्राण देना ।।

उचित-अनुचित, बुरे-अच्छे,
मार्ग का संज्ञान देना !
खो ना जाऊँ भीड़ में,
मेरी अलग पहचान देना ।।

बापू

बापू
--- कविवर्य सुमित्रानंदन पंत --

चरमोन्नत जग में जबकि आज विज्ञानज्ञान,
बहु भौतिक साधन, यंत्रयान, वैभव महान,

सेवक हैं विद्युत, वाष्पशक्ति, धनबल नितांत,
फिर क्यों जग में उत्पीड़न, जीवन यों अशांत?

मानव ने पाई देश-काल पर जय निश्चय
मानव के पास नहीं मानव का आज हृदय !

है श्लाघ्य मनुज का भौतिक संचय का प्रयास,
मानवी भावना का क्या पर उसमें विकास ?

चाहिए विश्व को आज भाव का नवोन्मेष,
मानवउर में फिर मानवता का हो प्रवेश !

बापू ! तुम पर हैं आज लगे जग के लोचन,
तुम खोल नहीं पाओगे मानव के बंधन ?

Saturday, September 23, 2017

बस, यूँ ही....

नौकरी, घर, रिश्तों का ट्रैफिक लगा, 
ज़िंदगी की ट्रेन छूटी, बस यूँ ही !!!

है दिवाली पास, जैसे ही सुना,
चरमराई खाट टूटी, बस यूँ ही !!!

डगमगाया फिर बजट इस माह का,
हँस पड़ी फिर आस झूठी, बस यूँ ही !!!

साँझ की गोरी हथेली पर बनी,
सुर्ख रंग की बेलबूटी, बस यूँ ही !!!

झोंपड़ी में चाँदनी रिसती रही,
चाँद कुढ़ता बाँध मुट्ठी, बस यूँ ही !!!

एक दीपक रात भर जलता रहा,
तमस की तकदीर फूटी, बस यूँ ही !!!

राह तक पापा की, बिटिया सो गई,
रोई-रोई, रूठी-रूठी, बस यूँ ही !!!




Sunday, September 17, 2017

स्पंदन - विहीन !

ओ रंगीले भ्रमर !
कैसे स्वागत करती तुम्हारा ?
लाख कोशिशों से भी मुझे,
कुमुदिनी बनना न आ सका !
कंटकों के बीच जन्मी
कुसुम कलिका तो थी मैं,

किंतु.....
नागफनी का पुष्प बनकर
खिलना भी कोई खिलना है ?
गंध - मरंद विहीन !!!

ओ मेरे हृदय !
नहीं सीख पाई मैं,
तुम्हारी धड़कन बनकर गूँजना !
साँसों में समाकर, रक्त में घुलकर,
तुमको छूकर निकलती रही,
क्षण प्रतिक्षण !!!

किंतु......
गीत ना बन सकी धड़कनों का !
खामोश साँसों का
संगीत भी कोई संगीत है ?
प्रतिध्वनी विहीन !!!

ओ मेरे कवि !
नहीं बन पाई मैं,
तुम्हारी प्रेरणा, आराधना !
मैं तुम्हारी कलम की स्याही बन
थामती, सँभालती रही तुम्हारी,
भावनाओं के ज्वार को !!!

किंतु.....
स्थान मेरा सदा ही,
तुम्हारी नजरों के दायरे में रहा,
मन मस्तिष्क में नहीं !
बेजान अहसासों के साथ,
जीना भी कोई जीना है ?
स्पंदन विहीन !!!












Friday, September 15, 2017

अबूझे प्रश्न


मैंने नजर उठाकर देखा,
जब भी अपने चारों ओर...
स्वार्थ, ईर्ष्या औ' लालच का,
पाया कहीं ओर ना छोर ।

सहते रहते क्यों हर पीड़ा 

मूक, मौन, निष्पाप ह्रदय ?
किन पापों की सजा भुगतते,
निष्कपटी, निर्दोष, सदय ?

क्यों लगता है मुझको ऐसा,

सारी खुशियाँ हैं झूठी,
खिलने के पहले ही आखिर,
क्यों इतनी कलियाँ टूटीं ?

क्यों गुलाब को ही मिलता है,

हरदम काँटों का उपहार ?
क्यों रहता है कमल हमेशा,
कीचड़ में खिलने, तैयार ?

क्यों लगते हैं नकली, सारे

रिश्ते नातों के बंधन ?
इस जीवन - सागर के तट पर,
क्यों एकाकी मेरा मन ?

मन चंचल, उत्सुक बच्चे सा,
तंग करे हर पल मुझको,
निशि दिन करता है प्रश्न नए,
बोलो क्या उत्तर दूँ उसको ?

Thursday, September 14, 2017

हिंदी का क्या है !

वाणी पिछले बारह वर्षों से एक अंग्रेजी माध्यम के प्राइवेट स्कूल में बतौर हिंदी शिक्षिका कार्यरत थी।
वाणी हिंदी में एम ए थी, वो भी विशेष योग्यता के अंकों के साथ, किंतु स्कूल में हिंदी पढ़ाते समय उसे अनेक कटु अनुभवों से दो चार होना पड़ा । उसने पाया कि ना हिंदी का कोई सम्मान है और ना हिंदी शिक्षिका का ।

कई बार तो उसने पाया कि हिंदी के घंटे में पिछ्ली बेंचों पर विद्यार्थी गणित, अंग्रेजी या विज्ञान का काम करते रहते थे । हिंदी का क्या है, आसान तो है, परीक्षा के समय पढ़ लेंगे तो भी बहुत है, यह विचार बच्चों के मन में घर कर चुका था। वाणी ने यह भी पाया कि बच्चों के अभिभावक भी हिंदी की पढ़ाई के प्रति लापरवाह थे ।

हिंदी में बच्चों की लिखावट पर भी निचली कक्षाओं से ही ध्यान नहीं दिया था किसी ने । मात्राओं और व्याकरण की अशुध्दियाँ तो आम बात थी। केवल गिने चुने विद्यार्थी ही थे जो हिंदी को अन्य विषयों की तरह गंभीरता से लेते थे हालांकि उद्देश्य उनका भी एक ही था - कुछ प्रतिशत अंक ज्यादा पा लेना।

.......वाणी भी कितना करती ? आठवीं कक्षा तक नई शिक्षानीति की मेहरबानी से उत्तीर्ण होते आए विद्यार्थी जब उसे नवीं या दसवीं में मिलते, तो उनकी हालत देख वह सिर पकड़ लेती । कइयों को ठीक से पढ़ना नहीं आता, स्वर और व्यंजन तक का ज्ञान नहीं होता ।

खैर, अपनी कड़ी मेहनत और बालकों के प्रति सहानुभूतिपूर्ण अपनत्व से वाणी हिंदी विषय और हिंदी साहित्य में विद्यार्थियों की रुचि जगाने में सफल रही थी। अंग्रेजी माध्यम के विद्यार्थी थे इसलिए उन्हें जितना हो सके, सरल शब्दों में समझाती । हिंदी की कविताएँ गाकर सुनाती ताकि बच्चों को हिंदी से लगाव हो जाए। हिंदी की पाठ्येतर पुस्तकें पढ़ने के लिए प्रोत्साहित करती । हिंदी से संबंधित अनेक स्पर्धाओं में अपने छात्र छात्राओं को अव्वल आते देख वह फूली नहीं समाती थी।

बारह वर्ष बीत गए। अब वाणी स्कूल में हिंदी की विभागाध्यक्ष थी। इस वर्ष हिंदी दिवस को विशेष तौर से मनाने की योजना उसने तैयार कर रखी थी। प्रधानाध्यापकजी से अनुमति भी ले ली थी। बच्चों से तैयारी भी शुरू करवा दी थी । 13 सितंबर को आधी छुट्टी के बाद चपरासी आया, "मैम, प्रिंसिपल सर ने आपको बुलाया है।"
अगला पीरियड खाली था तो वाणी प्रिंसिपल के कार्यालय में जा पहुँची । प्रिंसिपलजी ने उसे बैठने का आदेश दिया और धीर गंभीर आवाज में बोले-
"वाणी, कल का कार्यकम रद्द कर दो।"
वाणी पर तो मानो बिजली गिर पड़ी। उसने थोड़ा नाराजी भरे स्वर में कहा, " लेकिन सर, बच्चे सारी तैयारी कर चुके हैं ।"
प्रिंसिपल - "हाँ, तो उनकी तैयारी व्यर्थ तो नहीं जाएगी। किसी और स्पर्धा में काम आ जाएगी। कल मैनेजमेंट के लोग आ रहे हैं । स्कूल का मुआयना और टीचर्स के साथ मीटिंग करना चाहते हैं। मैं भी व्यस्त रहूँगा ।"
वाणी क्या कहती ? हालांकि कहना तो बहुत कुछ चाहती थी पर जानती थी कि प्रिंसिपल मैनेजमेंट को जवाब नहीं दे सकते । उनकी मजबूरी है।
अगले दिन 14 सितंबर था। वाणी ने अपनी कक्षा में ही छोटी सी निबंध स्पर्धा आयोजित कर ली । अन्य छात्रों को समझा-बुझाकर लौटा दिया।
पाठशाला की छुट्टी के बाद सभी शिक्षकों को सभागृह में रुकना था, मीटिंग के लिए । मैनेजमेंट के प्रतिनिधि बोलने के लिए खड़े हुए । सामान्य बातों के बाद उन्होंने कहा -
The agenda of today's meeting is to discuss about encouraging our students to speak in English. It is very sad that most of the times our teachers also speak in Hindi. How will the students develop habit of speaking in English ? Ours is an English medium school. I want that from today itself, all of us should start speaking in English, at least in the school premises. No other language. I hope you.........

आगे ना जाने क्या क्या कहा उन्होंने..... वाणी ने कुछ नहीं सुना । उसके कानों में उसके प्रिय गीत की पंक्तियाँ गूँज रही थीं -
                  हिंदी हैं हम वतन है, हिंदोस्तां हमारा....

......और उसकी आँखें हिंदी दिवस और हिंदी से जुड़े अपने सपनों को चकनाचूर होते देख रही थीं...... सोच रही थी वह कि आखिर कौन जिम्मेदार है नई पीढ़ी की इस सोच के लिए कि - हिंदी का क्या है !!!

Saturday, September 9, 2017

अंधेर नगरी, चौपट राजा !

अंधेर नगरी, चौपट राजा !
टका सेर भाजी, टका सेर खाजा !

राजा पर कोई, अँगुली उठाए,
अँगुली क्या, गर्दन अपनी कटाए !
पंगु व्यवस्था है, अंधा कानून
रोम जले, नीरो बाँसुरी बजाए !

श्वापदों से क्रूरतम, अब मनुष्य हो गया,
सत्य और अहिंसा की, चिताएँ सजा जा ।।
अंधेर नगरी, चौपट राजा !

रामजी के देश में, रावणों का राज
बर्बरता, निष्ठुरता, दमन का रिवाज !
मुँह पर बाँधो पट्टी, बोलो इशारों में
गंध लहू की पसरी, गलियों बाजारों में !

नीच,बोल बोल रहे, ठोंक ठोंक छाती !
लज्जा का चीरहरण, तू भी करवा जा ।।
अंधेर नगरी, चौपट राजा !

आजादी की दुल्हन ने, फाँसी लगाई
धर्म औ' सियासत की, हो गई सगाई !
बेबाक दीवानों को, अक्ल नहीं आई
बोलने की कीमत, रक्त से चुकाई !

झूठी संवेदना की,चाह नहीं रूहों को,
फिर भी श्रद्धांजलि की, रस्म तो निभा जा ।।
अंधेर नगरी, चौपट राजा !

Thursday, September 7, 2017

चलो, खिल्ली उड़ाएँ

चलो हम खिल्ली उड़ाएँ,
लोग जो अच्छे हैं,सच्चे हैं,
सरल हैं, सीधे हैं,
देश की जो सोचते हैं,
भाईचारा पोसते हैं,
उन्हें धमकाएँ, डराएँ !!!
हम मजाक उनका बनाएँ !!!

वे युवक,जो नहीं करते
नकल पश्चिम सभ्यता की,
वे युवतियाँ, जो नहीं करती
तमाशा असभ्यता का,
आज भी रखें बड़ों का मान,
मर्यादा रखें छोटों की जो !
चलो उनको बरगलाएँ
उनकी हम खिल्ली उड़ाएँ !!!

जो ना लें रिश्वत, नहीं हों
लिप्त भ्रष्टाचार में,
जो करें विश्वास,
नेकी, दया, सदाचार में.
खरी सच्ची बात कह दें,
बिन डरे और बिन झुके
दिन को दिन और
रात को जो रात कह दें
मार्ग से उनको हटाएँ !!!

चलो, हम खिल्ली उड़ाएँ !!!



Monday, September 4, 2017

अध्यापक, शिक्षक या टीचर ?

ओ एकांत कुटी-चर !
तू टीचर बनकर कहाँ आ गया !
वन के पशु भी सजग रहे,
पर तू ही धोखा यहाँ खा गया !

तू वशिष्ठ था जिन्हें, राम भी,
कर प्रणाम, सौभाग्य समझते !
सांदीपन की समिधा लाते,
कृष्ण सुदामा मेह बरसते !
यदि चाणक्य नहीं होते तो,
चंद्रगुप्त को कौन जानता ?
खो आया सम्मान कहाँ, वह
जिसको तेरे नैन तरसते !!!
अरे ! चंद चाँदी के टुकड़ों,
पर जीना क्यों तुझे भा गया ?
ओ एकांत कुटीचर !
तू टीचर बनकर कहाँ आ गया !

जिस समाज में रहने आया
वह तो तेरे योग्य नहीं था,
अब तू उसके योग्य नहीं है
यह विडंबना दुःखद नहीं क्या ?
देख पराई चुपड़ी को तू,
क्यों अपना जी ललचाता है ?
अरे, भूल पर भूल ना करना,
रह पाएगा तू ना कहीं का !!!
रक्षा कर लो उस गुरुत्व की,
जिसे विश्व में देश पा गया !
ओ एकांत कुटीचर !
तू टीचर बनकर कहाँ आ गया !

साहस रख, प्रत्येक परिस्थिति,
स्थाई कभी न रहे, ना रही है !
आज राष्ट्र की बागडोर,
अध्यापक के हाथों में ही है !
भूल गए वो यदि अपना,
पूर्व रूप, तो भी चिंता क्या ?
नया वर्ग निर्माण, यह भी
ध्रुव सी अविचल,बात नहीं क्या ?
शिक्षक वर्ग कहेगा- 'शिक्षक व्यर्थ नहीं'
कुछ यहाँ रह गया !
ओ एकांत कुटीचर !
तू टीचर बनकर कहाँ आ गया ?
( कुटी-चर = कुटिया का वासी )
***********************

यह कविता मेरी रचना नहीं है। मेरी एक छात्रा वंदना शर्मा ने मुझे यह कविता कुछ वर्षों पहले दी थी। 'शिक्षक दिवस' के अवसर पर मेरे संकलन से आज यह सुंदर कविता आप सभी के पठन हेतु प्रस्तुत है......

Saturday, September 2, 2017

शब्द

मानव की अनमोल धरोहर
ईश्वर का अनुपम उपहार,
जीवन के खामोश साज पर
सुर संगीत सजाते शब्द !!!

अनजाने भावों से मिलकर
त्वरित मित्रता कर लेते,
और कभी परिचित पीड़ा के
दुश्मन से हो जाते शब्द !!!

चुभते हैं कटार से गहरे
जब कटाक्ष का रूप धरें,
चिंगारी से बढ़ते बढ़ते
अग्निशिखा हो जाते शब्द !!!

कभी भौंकते औ' मिमियाते
कभी गरजते, गुर्राते !
पशु का अंश मनुज में कितना
इसको भी दर्शाते शब्द !!!

रूदन,बिलखना और सिसकना
दृश्यमान होता इनमें,
हँसना, मुस्काना, हरषाना
सब साझा कर जाते शब्द !!!

शब्द जख्म और शब्द दवा,
शब्द युद्ध और शब्द बुद्ध !
शब्दों में वह शक्ति भरी, जो
श्रोता को कर दे निःशब्द !!!

बिन पंखों के पंछी हैं ये
मन-पिंजरे में रहते कैद,
मुक्त हुए तो लौट ना पाएँ
कहाँ-कहाँ उड़ जाते शब्द !!!

Friday, September 1, 2017

हद हो गई !

हमने इक पत्थर उठा, मंदिर में मन के रख लिया,
लोग कहते हैं हमारे, प्यार की हद हो गई....

आँख मूँदे, हाथ थामे, साथ तेरे  चल पड़े
अजनबी एक शख्स पर, ऐतबार की हद हो गई...

हाँ, कि दिल जलता है ग़र तुम दूसरों को देख लो
ये तुम्हारे पर मेरे इख़्तियार की हद हो गई...

देखकर हमको, तेरा वो मुँह घुमा लेना सनम !
बेरुखी तेरी, दिले - बेज़ार की हद हो गई....

जिस्म की मंडी लगी, रूहों का सौदा हो गया,
जब मोहब्बत बिक गई, व्यापार की हद हो गई....

राह तकता रह गया था, चाँद की कोई चकोर
वो अमावस रात थी, इंतज़ार की हद हो गई....