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Wednesday, August 9, 2017

उम्मीद

अंधकार दूर हो,
उम्मीद हो उजास की !
विकास की घड़ी में बात
मत करो विनाश की।।

भिन्न-भिन्न, दूर-दूर,
हम रहे कई सदी,
दुश्मनों को देश की,
बागडोर सौंप दी ।

अब मिटा दो दूरियाँ,
जोड़ दो कड़ी-कड़ी
ना रहे कोई प्रथा,
भेदभाव से जुड़ी ।

अब नई हवा बहे,
एक प्राण-श्वास की !
विकास की घड़ी में बात,
मत करो विनाश की।।

हर किसान, हर जवान
की व्यथा का अंत हो
भूख की, अभाव की,
करूण कथा का अंत हो।

वक्त से पहले मिटें ना,
बचपने की मस्तियाँ
क्रूर पंजों में फँसें ना,
बुलबुलें औ' तितलियाँ ।

जुगनुओं से भी मिले,
इक किरण प्रकाश की !
विकास की घड़ी में बात
मत करो विनाश की ।।

Saturday, August 5, 2017

कैसे ?

जाने बदला क्यूँ रुख हवाओं का,
मिजाज़ रुत का भी है बदला सा !
प्यार का फलसफा सदियों से वही
वक्त के साथ हम बदलें कैसे ?

आज बच्चे सी मचलकर आती
ज़िद्दी यादों को थाम ले कोई !
द्वार पर दे रहीं दस्तक मन के,
लौट जाने को भी कहें कैसे ?

एक पंछी को रोज देखा है,
बातें करते हुए दरख्त के संग !
नाम दोनों के पाक रिश्ते का,
कोई पूछे तो बताएँ कैसे ?

हमने बादल से गुज़ारिश की है,
बरस जाए वो, जमीं पर दिल की!
कोई कदमों के निशां छोड़ गया,
अपने अश्कों से मिटाएँ कैसे ?

गर वो कह दें, कि अब चले जाओ
लौट जाएँगे उनकी महफिल से !
जान देकर वफ़ा निभा देंगे,
अब कहो, और निभाएँ कैसे ?

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