Saturday, January 13, 2018

अलाव

पेड़ों के टूटे पत्ते, कागज,
टूटी छितरी डालियाँ
कर इकट्ठा सुलगा दीं किसी ने !
सिमटे - ठिठुरते भिखमंगों,
अधनंगे फुटपाथियों की
सारी ठंड बटोरकर,
काँपता रहा अलाव !!!

पिता के झुकते कंधे,
माँ की उम्मीदभरी आँखें
कैसे करे वो सामना ?
आज भी ना मिली नौकरी !
तमाम डिग्रियाँ,आग में झोंककर
लगाया उसने जोरदार कहकहा,
सिसकता रहा अलाव !!!

अधभरे पेट से छल करते,
अलाव के चारों ओर
थिरकते पैर, बजती खंजड़ी,
चूल्हे पर खदबदाती खिचड़ी !
रैनबसेरा करते खानाबदोश
चल देंगे सुबह नए ठिकाने,
बंजारा हो गया अलाव !!!