Wednesday, February 7, 2018

तुम्हारे स्नेह से !

चेतना का दीप
जल उठा, तुम्हारे स्नेह से !
तप्त उर-धरा में तुम,
बरस गए हो मेह से !
              चेतना का दीप
              जल उठा, तुम्हारे स्नेह से !

प्राणों की वर्तिका,

बुझी-बुझी अनंत काल से !
श्वासों के अब सुमन
लगे थे, टूटने ही डाल से !
यूँ लगा था, आत्मा
बिछड़ गई हो देह से !
              चेतना का दीप
              जल उठा, तुम्हारे स्नेह से !

अगेय गीत थे मेरे,

अबोल छंद, राग थे !
थी बंदिनी हर कल्पना,
आबद्ध सारे भाव थे !
अभिव्यक्ति के बिना मेरे,
शब्द थे विदेह - से !
           चेतना का दीप
           जल उठा, तुम्हारे स्नेह से !

युगों की यामिनी के बाद,

प्रीति सूर्य का उदय !
बिंदु - बिंदु, प्रेम - सिंधु,
पी रहा तृषित हृदय !
जीतकर हारी - सी मैं,
तुम हारकर अजेय - से !
             चेतना का दीप
             जल उठा, तुम्हारे स्नेह से !