Wednesday, March 14, 2018

बाँसुरी

बाँसुरी - 1-
बाँस का इक नन्हा सा टुकड़ा,
पोर - पोर में थीं गाँठें !
जीवित था पर प्राण कहाँ थे ?
चलती थीं केवल साँसें !!!

मन का मौजी, सुर का खोजी
कहीं से इक यायावर आया !
काटा, छीला, किया खोखला,
पोर - पोर संगीत सजाया !!!

पीड़ा से सुर की उत्पत्ति,
हृदय भेद कर निकला राग !
बहने लगा मधुर रस बनकर,
यायावर का वह अनुराग !!!!

ओठों से तब, लगा के अपने,
उसने छेड़ा प्रीत का गीत !
बाँस का टुकड़ा, बना बाँसुरी,
यायावर, प्राणों का मीत !!!!
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 बाँसुरी - 2 -
यह कौन प्राण फूँकता निष्प्राण देह में,
अपने ही प्रश्न से हुई हैरान बाँसुरी ।।

अपने छुपे गुणों से थी अनजान बाँसुरी,
अब गा उठी, थिरक उठी बेजान बाँसुरी ।।

अधरों के स्पर्श से सिहर, निखर-निखर उठी,
बन गई माधुर्य की, पहचान बाँसुरी ।।

मन में कसक उठा गई, जब-जब बजी वेणु,
मीठा-सा दर्द दे गई, नादान बाँसुरी ।।

सपनों में सुना जाती है, रस से भरी बतियाँ
सूने हृदय की, बन गई मेहमान बाँसुरी ।।