Sunday, April 8, 2018

चिड़िया चली शहर से दूर !

चिड़िया चली शहर से दूर,
शोर उसे था नामंजूर,
वहाँ पेड़ बचे ना हरियाली,
ना है दाना ना पानी !!!!
भटकी इधर-उधर बेचारी
सुन लो उसकी करूण कहानी !

भूख-प्यास से हुई अधीर,
चिड़िया गई नदी के तीर,
मैला, दूषित पाया नीर,
"हाय ! मेरी फूटी तकदीर !!!
आ गए प्राण कंठ में मेरे"
रोकर बोली चिड़िया रानी !
भटकी इधर-उधर बेचारी
सुन लो उसकी करूण कहानी !

चिड़िया पहुँची इक जंगल में,
सोचा रहूँ यहाँ मंगल में,
टूटी यह आशा भी पल में,
देखे आते मानव दल में !!!
उनके हाथ कुल्हाड़ी, आरी,
उनकी नीयत थी शैतानी !
भटकी इधर-उधर बेचारी
सुन लो उसकी करूण कहानी !

नहीं सुरक्षित वन-उपवन,
देखूँ अब पर्वत प्रांगण,
चिड़िया पहुँची पर्वत पर,
वहाँ चल रहे बुलडोजर !!!
घूम रहे थे नर - नारी,
करते अपनी मनमानी !
भटकी इधर-उधर बेचारी
सुन लो उसकी करूण कहानी !

चिड़िया गई गाँव - देहात,
वहाँ भी बिगड़े थे हालात,
बढ़ रहे जुर्म और अपराध,
कहीं थे धर्म, कहीं थी जात !!!
नहीं श्रम का कोई सम्मान,
कर्ज में डूबे श्रमिक, किसान,
बँट गए खेत, बँटे खलिहान,
सभी के अलग अलग भगवान !!!

कहाँ जाए अब नन्ही जान,
खाक दर - दर की उसने छानी !
भटकी इधर-उधर बेचारी
सुन लो उसकी करूण कहानी !