Friday, September 7, 2018

बंधन

क्यों बाँधा मुझको बंधन में ?

रिश्तों के बंधन से ऊपर,
कुछ भाव, भाव से मिलते थे
दुनिया की परिपाटी तजकर
दो हृदय चाव से मिलते थे !
जब व्यथा एक को होती थी,
आँसू दूजे की अँखियन में !!!
क्यों बाँधा ऐसे बंधन में ?

मितवा मेरे, मनमीत बने
तुम मनवीणा के गीत बने
निर्जन में कोकिल कूजन सा
वीराने का संगीत बने !
पदचाप तुम्हारी सुनती हूँ,
अब भी मेरे उर आँगन में !!!
क्यों बाँधा ऐसे बंधन में ?

बंधन यह उर से धड़कन का,
बंधन श्वासों से स्पंदन का,
यह बंधन था मन से मन का,
बंधन प्राणों से ज्यों तन का !
मन के अथाह अंधियारे में
जीवन बीतेगा भटकन में !!!
क्यों बाँधा मुझको बंधन में ?

जब पुष्प सूख गिर जाता है,
तब वृक्ष ना अश्रु बहाता है
जब नदी सूखकर मृत होती,
सागर तब भी लहराता है !
मैं बद्ध हुई, तुम मुक्त रहे,
स्वच्छंद विहग-से उपवन में !!!
क्यों बाँधा मुझको बंधन में ?

मन के अथाह अंधियारे में
जीवन बीतेगा भटकन में !!!
क्यों बाँधा मुझको बंधन में ?