Sunday, December 2, 2018

बंदिश लबों पे....

बंदिश लबों पे, लफ्जों पे पहरे बिठा दिए
अश्कों की हद में जख्म कुछ गहरे बिठा दिए।

है फासिला सदियों का हकीकत औ' ख्वाब में
अच्छा किया जो ख्वाब सुनहरे मिटा दिए।

सच ही कहा है वक्त को बेताज बादशाह
लोगों के वक्त ने असल चेहरे दिखा दिए।

एक ही गुलशन के गुल, किस्मत अलग-अलग
कुछ से सजे सेहरे, तो कुछ अर्थी सजा दिए।

बनकर नदीम लूटनेवालों का क्या करें
इंसानों को शतरंज के मोहरे बना दिए।

(नदीम - दोस्त/साथी)